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Saturday, December 28, 2024

बादलों को खत लिखा। 51

बादलों को खत लिखा

क्यों छुपाते हो ग़मो को।।

दाग गहरे हो लिए तुम

खोल दो सारे भ्रमों को।

साथ ले इतने ग़मों को

कब तलक तुम यूं फिरोगे।

वो समय भी आयेगा ही 

अश्रु बनकर तुम गिरोगे।

मेरी आंखों में भी शायद 

काले बादल कुछ छुपे हैं।

जाने कितने प्रश्न हैं पर 

बुंदों में ही हल छुपे हैं।

बात बस इतनी लिखी

कि सारे बादल रो दिए।

आंसुओं का रूप ले

सारे गमों को धो दिए।

मन 50

मन ही जाने मन के भीतर चलता क्या है।

मन की दीवारों पर उठता गिरता क्या है।

मन की अपनी भाषा है

आशा और निराशा है।

सब प्रश्नों के उत्तर मन में

मन में ही जिज्ञासा है।

किस में है वो सफल और विफलता क्या है।

मन ही जाने मन के भीतर चलता क्या है।

कुछ ना उसकी थाह चले

मन अपनी प्रवाह चले।

कोई निश्चित दिशा नहीं

मन अनंत की राह चले।

खुद उसमें ही जलता और पिघलता क्या है।

मन ही जाने मन के भीतर चलता क्या है।

सवालात 49

खुद अपने ज़मीर से भी कभी बात कीजिए।

बस यूं ही कभी खुद से मुलाकात कीजिए।


अश्कों में छिपी बात समझता नही कोई

बेवजह ही आंखों से ना बरसात कीजिए।


जो वक्त गुजर जाएगा वापस ना आएगा

बेकार की बातों में ना दिन रात कीजिए।


मुमकिन तो है गैरों में कुछ खामियां मगर 

गर हो सके खुद से भी सवालात कीजिए।


कुछ बात हो गई है तो दिल से निकालिए

हर बात पर ऐसे ना फ़सादात कीजिए।


अब रूबरू बैठे हैं तो चुपचाप ना रहिए 

बेबात ही सही मगर कुछ बात कीजिए।

जीवन सागर 48

जीवन सागर हम हैं कश्ती 

बहते किसी सहारे।

बहते बहते लग जाएंगे

हम भी किसी किनारे।।

कश्ती की अपनी किस्मत है

जाने कौन दिशा में जाए।

संग नही है कोई उसके

आकर उसको राह बताए।

उठती गिरती लहरों में ही

छिपे हैं सभी इशारे। 

जीवन सागर हम हैं कश्ती

बहते किसी सहारे।।

फंसेगी जब वो बीच भंवर में

आकर कोई निकालेगा।

इतना तो उम्मीद हमे है

कश्ती कोई बचा लेगा।

दूर दूर तक दिखे ना कोई

किसको कौन पुकारे।

बहते बहते लग जाएंगे

हम भी किसी किनारे।।

अपने मन की कहना है। 47

अपने मन की कहना है।

कभी कभी चुप रहना है।


कभी तो होगी तेज धूप 

और कभी रहे ठंडी छाया।

धूप - छांव का आना जाना

कुछ ना कुछ तो सहना है।


दुख अगर आया है तो फिर

सुख भी एक दिन आयेगा।

दुख के पर्वत बड़े हों कितने

इक ना इक दिन तो ढहना है।


समय एक सा नहीं है रहता

समय बदलना निश्चित है।

यूं ही समय के धारे के संग

हमे निरंतर बहना है।


एक शक्ल जो मिला है शायद

उससे काम नहीं चलता।

कोई ना कोई मुखौटा सबने

कभी ना कभी तो पहना है।

पूर्ण विराम 46

अर्ध विराम;

अल्प विराम,

प्रश्न सूचक?

विस्मयादिबोधक !

हर पर हर क्षण

व्याकरण चिन्हों से

भरा ये जीवन 

अग्रसर रहता है

एक बड़े चिन्ह 

पूर्ण विराम की तरफ।

अपने अपने हाल निकालो 45

मन से सभी बवाल निकालो।

बालों के मत खाल निकालो।

अनसुलझे जो पड़े हुए हैं 

ऐसे सभी सवाल निकालो।


दुविधाओं से शंकाओं से

अंतर्मन यदि भरा हुआ हो।

खुशियों की यूं राह न रोको

मन से सब जंजाल निकालो।


जीवन की शतरंज बिछी है

सुख और दुख में बाजी है।

दुख हारे और सुख ही जीते

ऐसी कोई चाल निकालो।


है मशरूफ बहुत ये दुनिया

किसको किसकी पड़ी यहां।

अपने मन में खुद ही झांको

अपने अपने हाल निकालो।

Monday, August 5, 2024

रहगुजार ढूंढता हूं 44

सूनी सूनी सी मैं हर डगर ढूंढता हूं।

मैं कहां हूं मैं अपनी खबर ढूंढता हूं।


हो सफर ज़िंदगी का न कांटों भरा

मैं बस ऐसा कोई रहगुज़र ढूंढता हूं।


ग़म की रातों पे हमको भरोसा नही

शाम होने से पहले सहर ढूंढता हूं।


जाने क्यूं ज़िंदगी है खफा आजकल

कहां रह गई है मुझसे कसर ढूंढता हूं।


कोई लम्हा जो दिल को सुकूँ दे सके

बस वही हर घड़ी हर पहर ढूंढता हूं।

जिंदगी इम्तिहान लेती है। 43

 जिंदगी इम्तिहान लेती है।

पर इम्तिहान के पहले

कभी नहीं बताती 

इम्तिहान का शेड्यूल।

इम्तिहान का सिलेबस।

कब शुरू होगा।

कितने दिन चलेगा

कब खत्म होगा 

मूल्यांकन कैसे होगा।

कुछ भी नहीं बताती।

इसी बहाने जिंदगी 

हमें जान लेती है।

हमें पहचान लेती है।

जिंदगी इम्तिहान लेती है।

क्या करें ! 42

कोई नहीं है अपना ग़मख़्वार क्या करें।

रिश्तों में उठ गई जो दीवार क्या करें।


बादल हैं छंट गए पर धूप निकलने के

दिखते नहीं हैं कोई आसार क्या करें।


हर ग़म में या खुशी में जो साथ थे मेरे

अब कर रहे है वो भी इन्कार क्या करें।


कश्ती भी भंवर में है रूठा है नाख़ुदा

हाथों में नहीं कोई पतवार क्या करें।


अब दिन भी गुजरते हैं यूं ही किसी तरह

लंबी है कुछ गमों की कतार क्या करें।


अपनी ही जिंदगी से जब जंग छिड़ी हो

फिर जीत क्या करें और हार क्या करें।


सब बेच कर ग़मों को खुशियां खरीद लें

ऐसा नहीं है कोई बाजार क्या करें।

आवागमन 41

एक दुनिया इस तरफ

एक दुनिया उस तरफ

दोनो एक दूसरे से

पूर्णतया अपरिचित

बीच में अपरिभाषित

एक शून्य या अनंत 

सांस चले तो ये दुनिया

सांस रुके तो वो दुनिया

इससे उत्तम आवागमन

शायद कोई नही।

कोई नही।

Wednesday, July 10, 2024

कुछ कहती हैं धड़कनें 40

 यूं ही कभी सांसों के 

वार्तालाप सुन कर देखिए।

क्या कह रही हैं धड़कने 

चुपचाप सुन कर देखिए।


देखने में शांत लेकिन

जाने कितना शोर है।

भावनाओं में उलझती

जा रही कोई डोर है।

दिल के दरवाजे पर 

कोई पद-चाप सुनकर देखिए।

क्या कह रही है धड़कने

चुपचाप सुनकर देखिए।


सांसों की गिनती है निश्चित

बस यूं ही चलती रहे।

इस बहाने जिंदगी की

शाम भी ढलती रहे।

हो समय तो दिल के भी

संताप सुन कर देखिए।

क्या कह रही है धड़कने

चुपचाप सुनकर देखिए।

नाम में क्या रखा है। 39

 नाम में क्या रखा है।

सिर्फ अपने नाम का होकर 

हम आत्म केंद्रित होते हैं।

बहुत सीमित होते हैं।

नाम से बाहर निकलकर 

हम व्यापक होते हैं 

हमारा विस्तार होताहै।

ये अहसास होता है कि 

अपने नाम के अतिरिक्त 

हम कुछ और भी हैं।


                     यथार्थ

            ----------------------

जीवन जीने का अभ्यास।

कल्पनाओं में जीते हुए

यथार्थ समझने का प्रयास।

कभी योजना के अनुसार 

कभी बस यूं ही अनायास

अक्सर होता रहता है 

यथार्थ का आभास।

एक एहसास ऐसा भी 38

 एक समय था जब 

हम बाल कटाने जाते थे

नाई कुर्सी के दोनो हत्थों पर

एक पटरा रख देता था।

उस पर हम बैठते 

फिर नाई बाल काटता था।

यही क्रम चलता रहा

फिर एक दिन उसने कहा

कुर्सी पर ही बैठे रहिए

पटरे की जरूरत नहीं है।

उसी दिन से ये एहसास हुआ

हम भी बड़े हो गए।

अलग बात है। 37

 दर्द में डूब जाना अलग बात है।

दर्द में मुस्कुराना अलग बात है।


वो जो नही आए ये अलग बात है

आ के फिर लौट जाना अलग बात है।


साथ ना दे कोई तो अलग बात है

राह में छोड़ जाना अलग बात है।


ख्वाब आंखों में आना अलग बात है

ख्वाबों का टूट जाना अलग बात है।


ना उठाएं किसी कोआलग बात है

पर उठा कर गिराना अलग बात है।


पलकों में ख्वाब आना अलग बात है

पलकों का भीग जाना अलग बात है।

Friday, June 7, 2024

हम कुछ हैं 36

सुबह उगते सूरज के साथ 

ये एहसास होता है कि

हम भी कुछ हैं। 

सूरज चढ़ते रहने के साथ

कुछ होने का एहसास भी

निरंतर बढ़ता जाता है।

फिर एक समय आता है

कुछ होने का एहसास

चरम सीमा पर पहुंचता है।

सूरज नीचे ढलने लगता है।

फिर प्रारंभ हो जाता है

कुछ ना होने का एहसास।

शाम सूरज ढल जाने पर 

ये एहसास होता है कि 

कुछ भी नहीं हैं हम।

शाम के बाद रात आती है

हम भी सो जाते है

फिर सुबह कुछ होने के लिए।

फलसफे 35

 रहे ख्यालों में ख्वाबों में जो नहीं आए।

सवाल वो थे जवाबों में जो नहीं आए।


लिए हिसाब मैं बैठा हूं बीते लम्हों का

न जाने कैसे हिसाबों में जो नहीं आए।


जुर्म जिसने किए चेहरा छुपाए बैठे थे

फंस गए वो नकाबों में जो नहीं आए।


खुद अपनी बेबसी पर कुढ़ते ही रहे 

वो कांटे गुलाबों में जो नहीं आए।


कुछ ऐसे भी फलसफे हैं दुनियादारी के

रहे जुबां पे किताबों में जो नहीं आए।

पैगाम लिखता हूं। 34

कुछ भी हो हर सफर का अंजाम लिखता हूँ।

थके पैरों के जानिब से कोई मक़ाम लिखता हूँ।

जिल ना मिले तो इसका गिला रास्तों से क्यूं

खुद अपने ही सर मैं सारे इल्जाम लिखता हूँ।

हर शाम को मालूम है कि आएगी सहर भी

अंधेरों की हर कोशिश को नाकाम लिखता हूँ।

शायद वो लफ्ज़ों को अपने दिल से पढ़ता है

बस यही सोचकर मैं उसको पैगाम लिखता हूँ।

नहीं मिलती हैं दुआएं किसी भी बाजार में

चलो मैं अपनी दुआएं सभी के नाम लिखता हूँ

Wednesday, May 29, 2024

मदारी का मजमा

 


" मदारी "  ये एक शब्द जब भी सुनाई देता है या कहीं पढ़ने को मिलता है तो मन अतीत में चला जाता है। अपना स्कूली जीवन और किशोरावस्था का समय आंखों के सामने घूम जाता है। मदारी का कार्यक्रम उसके करतब के लिए कम लेकिन उसके बोलने की कला, उसकी वाकपटुता, उसकी रोचक और मनोरंजक बातों की वजह से ज्यादा प्रचलित होता था।

          स्कूल के बाहर तिराहे पर एक बड़ा सा छायादार पेंड़ हुआ करता था। स्कूल की छूटी के समय वहां कोई ना कोई मदारी अक्सर अपना करतब दिखाने के लिए मजमा लगाया करता था। इस तरह के मदारी के करतब वाले कार्यक्रम पहले एक आम बात हुआ करती थी।  किसी भी पेड़ के नीचे या किसी भीड़ भाड वाली जगह पर ये सब होता रहता था। 

      स्कूल की छुट्टी हो चुकी थी। कानों में एक डमरू और बांसुरी की आवाज सुनाई पड़ती है। कदम बरबस ही उसी तरफ चल पड़े। वहां पहुंचा तो मजमा पहले से ही लगा हुआ था। लेकिन भीड़ और बढ़े इसीलिए मदारी ने करतब शुरू नहीं किया था। लोग आते जा रहे थे, भीड़ बढ़ती जा रही थी। मैं भी एक उचित स्थान पर जा कर खड़ा हो गया। वहां से  पूरी भीड़ और मदारी सब साफ साफ दिख रहे थे। भीड़ एक गोलाकार आकृति में खड़ी थी। मदारी अपने बड़े से झोले से सब जरूरी सामान निकालकर अपने सामने लगा चुका था। बांसुरी और डमरू बजाते बजाते वो बीच बीच में कभी बांसुरी को और कभी डमरू को एक नकली मानव खोपड़ी के ऊपर घुमा दिया करता था। मदारी अपना काम शुरू कर चुका था। मदारी की बातें इतनी रोचक और मजेदार रहती थीं कि बात बात पर लोग ताली बजा रहे थे। मदारी अपनी लच्छेदार बातों के बीच बीच में डमरू और बांसुरी बजाना नहीं भूलता था। खेल शुरू हो चुका था। एक से एक करतब दिखाता जा रहा था। अपने हाथ में चाकू घुसा देना। एक से दो और दो से चार सिक्के बना देना। सिक्के गायब कर देना। अपने साथ आए एक बच्चे को एक टोकरी में रखकर गायब कर देना। बच्चे को हवा में उड़ा देना। एक नकली खोपड़ी से बातें करना। और भी कई तरह के करतब दिखा रहा था। करतब तो करतब ही रहते थे, सबसे ज्यादा आनंद लोग उसके मजेदार बातों, उसकी वाकपटुता और बोलने की कला का ले रहे थे। बीच बीच में वो मदारी लगों को डरा भी देता था। वो कहता कि जो लोग बिना पैसा दिए जाएंगे उनको तरह तरह के रोग हो जायेंगे। कभी कहता कि अगर कोई बिना पैसा फेंके यहां से गया तो 51 कदम चलने के बाद गिर जाएगा। 

           उसकी बातें इतनी प्रभावशाली होती थीं कि लोग डर भी जाते थे और पैसा भी दे देते थे। कार्यक्रम के दौरान ही वो एक दो बार पैसे फेंकने के लिए कहता रहता था। पैसे के लिए वो जमीन पर एक चद्दर बिछा देता था। एक ही कार्यक्रम में मदारी अपने बातों के जरिए दो चरित्र निभा लेता था। कभी अपने मनोरंजक बातों से वो लोगों को हंसने और ताली बजाने के लिए बाध्य कर देता और कभी अपने प्रभावशाली बातों से पैसे ना फेकने के लिए डरा भी देता था। 

              एक करतब की बात वो हमेशा करता था। अपने पूरे कार्यक्रम में वो अक्सर कहता रहता था , बीच-बीच में याद दिलाता रहता था कि सब लोग आखिरी करतब देखकर ही जाएंगे। वो करतब होता था  " सांप और नेवले की लड़ाई "। लोग उस आखिरी करतब " सांप और नेवले की लड़ाई " देखने के लिए अंत तक रुके रहते थे। उस आखिरी करतब तक आते आते वो लगभग सभी से पैसे वसूल कर चुका होता था। 

           मदारी का कार्यक्रम खत्म हो चुका था। "सांप और नेवले के लड़ाई " की बात तो वो बस यूं ही भीड़ को बांध रखने के लिए ही करता था। 

              इस डर से कि कहीं मैं 51 कदम चलने के बाद गिर ना जाऊं, मैने भी पचास पैसे का एक सिक्का उसकी तरफ उछाल दिया। शायद उसने "दीवार " फिल्म नहीं देखी थी वरना वो भी कह सकता था कि वो फेंके हुए पैसे नहीं उठाता। ये भी हो सकता है कि उसने फिल्म देखी हो लेकिन परिस्थितिवश ऐसा ना बोल पाया हो। 

        मैने सोचा कि ये मदारी तो चालू निकला। सांप और नेवले की लड़ाई शायद कोई और मदारी दिखाए। ये सोचकर वहां से चला आया। मदारी आज भी है जो सांप और नेवले की लड़ाई दिखाने के बहाने मजमा लगाते हैं।

Sunday, May 26, 2024

मौन 33

मौन भी तो सम्पूर्ण

मौन नही होता।

उसमे भी होती हैं बातें 

 सामान्य से भी अधिक। 

कभी कभी खुद से ही 

आत्म- साक्षात्कार।

कभी किसी अन्य की

काल्पनिक उपस्थिति

और आभासी बातें

संक्षिप्त या विस्तार।

मौन से परिचित 

कौन नही होता?

मौन भी तो सम्पूर्ण

मौन नही होता।

खाली पन्ना 32

वहां ऊपर कोई है।

जो रखता है 

हिसाब सबका।

जो लिखता है 

कहानियां सबकी

किसी किताब में।

एक इल्तज़ा है

बस मेरी उससे।

मेरी कहानी में 

कुछ पन्ने यूं ही

खाली छोड़ देना

खाली पन्नों में भी

लिखा होता है

बहुत कुछ।

अय्यारी 31

हैं लोग यहां कुछ ऐसे 

जिनकी ये फनकारी है।

है चाक-ए-गिरेबाँ लेकिन

नीयत में अय्यारी है।

कुछ फिक्र नहीं है उनको 

क्या सच्चा है क्या झूठा।

मतलब हो जिससे अपना 

उसकी ही तरफदारी है।


अब उनसे क्या है कहना

उनको है क्या समझाना।

बस स्वार्थ सिद्ध करने का

मिल जाए जिन्हें बहाना।

वैसे तो है खुदगर्जी

वो कहते हकदारी है।

कोई क्या बतलाए उनको

ये कैसी समझदारी है।


है चाक-ए-गिरेबाँ लेकिन

नीयत में अय्यारी है।

Monday, May 20, 2024

तुमसे परिभाषित शब्द मेरे 30

तुमसे परिभाषित शब्द मेरे

हर शब्द में हो परिभाषित तुम।

शब्दों में छिपे हैं अर्थ बहुत 

हर अर्थ में हो अनुवादित तुम।


जो गुजर गया सो गुजर गया

शब्दों में उनकी यादें है।

जो होना था पर नही हुआ

शब्दों में बस फरियादें हैं।

जो अर्थ हैं मेरे शब्दों के 

हर अर्थ में हो रेखांकित तुम।

हर शब्द में हो परिभाषित तुम।


गर शब्द समझ में आएगा

तो अर्थ समझ में आएगा।

क्या कह सकते हैं शब्दों से 

सामर्थ्य समझ में आएगा।

कितने भी विस्तृत अर्थ सही

हर अर्थ में हो प्रत्याशित तुम।

हर शब्द में हो परिभाषित तुम।

मेरे शब्दों ध्यान रहे 29

 मेरे शब्दों ध्यान रहे !

तुम मर्यादित ही रहना।

चाहे निकलो लेखनी से

या फिर जिह्वा से निकलो।

पाषाणी शब्दों के सम्मुख

हिम जैसा ही तुम पिघलो।

कहने को कुछ भी कहना 

पर सोच समझ कर कहना।

मेरे शब्दों ध्यान रहे !

तुम मर्यादित ही रहना।


अर्थ अनर्थ ना हो पाए 

एक निश्चित अर्थ तुम्हारा हो। 

जो भी कहना चाहो कह दो 

कोशिश ना व्यर्थ तुम्हारा हो।

हृदय से निकले भावों से

तुम अनुवादित ही रहना।

मेरे शब्दों ध्यान रहे !

तुम मर्यादित ही रहना।

तुम मर्यादित ही रहना।

जज़्बात मैं कैसे लिख दूं। 28

 इतनी बातें हैं कि हर बात मैं कैसे लिख दूं।

है ज़मीं सूखी तो बरसात मैं कैसे लिख दूं।


 ख्वाब आए नही और नींद भी नहीं आई

ऐसी रातों को भला रात मैं कैसे लिख दूं।


जाने क्यों आजकल वो क्यूं उदास रहता है

दिल के बिगड़े हुए हालात मैं कैसे लिख दूं।


कुछ तो बातें थीं जो होठों पे आ नही पाईं 

अपने वो सारे ही जज़्बात मैं कैसे लिख दूं।


वो तो आंखों से बयां करते है शिकवे अपने

अपने दिल के भी सवालात मैं कैसे लिख दूं।

मैं और मेरी रचनाएं । 27

बहुत आसान नहीं होता है
अपनी बातें खुद से कहना।
अपनी बातें खुद को लिखना।
यूं ही मैं कविताएं लिखता हूं।
गीत और गजल लिखता हूं।
ख्वाबों के महल लिखता हूं।
कभी कुछ बात लिखता हूं 
कभी बेबात लिखता हूं।
कुछ यहां के कुछ वहां के 
मुकम्मल हालात लिखता हूं।
आंखों में ख्वाब लिखता हूं।
अनगिनत सी यादें है दिल में
उनका हिसाब लिखता हूं।
कुछ कहानियां लिखता हूं
कुछ किस्से लिखता हूं।
कुछ दर्द कुछ यादें 
कुछ खुशियां कुछ गम 
मैं अपने हिस्से लिखता हूं।

एहतराम 26

यूं जिंदगी तमाम किए जा रहे हैं हम।

खुद से ही इंतकाम लिए जा रहे हैं हम।


पल भर की जिंदगी का कुछ भी पता नही

सदियों का इंतजाम किए जा रहे हैं हम।


हमने ही बनाए हुए हैं सब अपने मसअले 

सबको ही ये इल्जाम दिए जा रहे हैं हम।


वो एक नाम जुबां पर जो आ ही नही रहा

दिल में वही एक नाम लिए जा रहे हैं हम।


क्या सोचना कि कौन है कैसा मेरे लिए

सबका ही एहतराम किए जा रहा हैं हम।

Thursday, March 28, 2024

शब्द बहें पर अर्थ न बहने पाएं 25

दोनो पलकों के पीछे ही

एक बड़ा जल सागर है।

सागर की जल बूदों में

बसे हुए कुछ शब्द मेरे।

अपनी किसी वेदना में 

या दिल की संवेदना में

बूदें जब बहने पर आएं।

बस एक निवेदन है मेरा

ना शब्द मेरे बहने पाएं।

शब्द अगर बह भी गए 

तो वापस वो आ जाएंगे

ख्याल रहे बस इतना ही

कि शब्दों के बहते बहते 

ना अर्थ कभी बहने पाएं।

अर्थ अगर बह गए साथ

तो वापस वो ना आयेंगे

आए भी तो निश्चित ही

फिर मूल अर्थ खो जायेंगे।

वो अर्थ न वापस आयेंगे।

Sunday, March 24, 2024

झील में चांद 24

 ज़िंदगी तुमको निखरना होगा।

बस थोड़ा और बिखरना होगा।


सामने वो हैं आ गए शायद

अब तुम्हे आह भी भरना होगा।


झील में चांद उतर आया है 

उसे भी आज संवरना होगा।


एक नज़र यूं ही देखने के लिए

उसकी राहों से गुजरना होगा।


दिल उसे भूल रहा है अब तो

फिर से ज़ख्मों को उभरना होगा।

इबारत 23

 दिल में यादों की है छोटी सी रियासत अपनी।

यही इतनी सी है अनमोल अमानत अपनी।


उन्हे ही सोच लिया उनसे ही बातें कर लीं 

ऐसा लगता है मुकम्मल है इबादत अपनी।


अब तो दीवारों पर ही बोझ टिका है सारा

जवाब दे गई शहतीरे-ए-इमारत अपनी।


न जाने क्यों मेरी तरफ ही हैं सबकी नजरें

नही किसी से है दुनिया में अदावत अपनी।


जिनका वादा था मुश्किलों में साथ देने का

नहीं मालूम था करेंगे खिलाफत अपनी।


अपने हाथों की लकीरों पे यकीं है मुझको

कोई तो लिखता है तकदीर-ए-इबारत अपनी।


वो जो सुनता ही है हर शख्स की दुआवों में

वही करेगा बलाओं से हिफाजत अपनी।

Wednesday, March 6, 2024

जिंदगी के पड़ाव 22

 रास्ता सही है लेकिन घुमाव ज्यादा है।

खतरा कम है लेकिन बचाव ज्यादा है।


इस जिंदगी का है इतना ही फलसफा

सफर है बहुत छोटा पड़ाव ज्यादा है।


फैसले में देरी का सबब यही है शायद

मुंसिफ का मुल्जिम में झुकाव ज्यादा है।


हर आम आदमी का दिन कट रहा ऐसे

खुशियां हैं बहुत थोड़ी तनाव ज्यादा है।


मुंह फेर के बैठे है अपनो में ही कुछ लोग

बस कहने को ही हमसे लगाव ज्यादा है।

Saturday, March 2, 2024

बचपन वाली रंगीन छतरी 21

 बचपन में 

बारिश से बचने के लिए

पिता जी मेरे लिए एक 

रंगीन छतरी लाए थे।

हम छोटे थे इसलिए

छतरी भी छोटी थी।

कई रंग थे छतरी में।

रंग बिरंगी छतरी।

समय गुजरता गया

हम भी बड़े होते गए।

वो रंगीन छतरी अब 

छोटी लगने लगी थी।

बारिश से बचने के लिए

दूसरे विकल्प आ गए थे।

वो छोटी रंगीन छतरी

काफी समय तक थी

पुरानी हुई तो फट गई

और फिर नष्ट हो गई।

अब पिता जी नही हैं

वो छतरी भी नही है।

पर अब सोचता हूं कि

छतरी छोटी नही थी

उस समय भी बड़ी थी

आज भी होती तो 

वो बड़ी ही होती।

बहुत बड़ी होती।

यादें 20

              ( 1 )

कारवां यादों का मेरे आस-पास है।

होंठ हैं चुपचाप मगर दिल उदास है।

यूं तो दूरियों के सिवा कुछ भी नही है

रिश्तों में मगर अब भी कुछ तो मिठास है।


               ( 2 )

यादों व भूलने के किरदार एक हैं।

दोनो को जोड़ने के सब तार एक हैं।

दोनो के बीच में हैं दिल के कश्मकश

हैं फूल सबके एक और खार एक हैं।


                ( 3 )

मेरी खामोशियों के।

मेरी उदासियों के।

मेरी तन्हाइयों के

मेरी दानाइयों के।

बेहद अभिन्न मित्र।

तुम्हारे बोलते चित्र।

Saturday, February 24, 2024

काश मिल जाए। 19

सवाल जैसा हो वैसा जवाब मिल जाए।

मैं जैसा सोच लूं वैसा ही ख्वाब मिल जाए।

दिलों के खेल में बिल्कुल ये जरूरी तो नहीं

गुलाब देने के बदले गुलाब मिल जाए।


 ये तो चाहत नही कि आफताब मिल जाए।

दिलों के बीच का कुछ तो हिसाब मिल जाए।

मैं सारे हर्फ अपने होठों पर सजा लूंगा

तुम्हारे नाम की लिखी किताब मिल जाए।


        ( 2 ) 

जो कहे गए वो कतरा

जो कहना है वो समंदर।

समंदर में उछलती लहरें

लहरों में उभरती यादें

यादों में सिमटते तुम।

और तुझमें बिखरते हम।

खामोशियां 18

            ( 1 )

जो कही गईं 

वो थी कुछ बातें।

जो लिखे गए  

वो थे कुछ शब्द।

एक खालीपन लिए 

सब कुछ अपूर्ण।

उस खालीपन को 

उस अपूर्णता को

पूर्ण कर रही हैं। 

खालीपन भर रही हैं 

शब्द रहित 

स्वर रहित  

खामोशियां 

              ( 2 )


खामोशियां ही 

शब्दों को जन्म देती हैं।

खामोशियां ही 

शब्दों को मारती हैं।

शब्दों का जन्म-स्थल 

शब्दों का मृत्यु-स्थल

दोनो ही हैं

खामोशियां।

बात तो ये है 17

 बात तो ये है कि बात कुछ भी नही है।

जिंदगी से सवालात कुछ भी नही है।

आंखों से गिरते हुए अश्कों के सामने

बादलों की ये बरसात कुछ भीं नही है।


ऐसा नहीं कि जज़्बात कुछ भी नही है।

दिल पे लगता आघात कुछ भी नही है।

उन खुशियों से फैले उजालों के सामने

ये गम की अंधेरी रात कुछ भी नही है।


यादों के लिए दिन व रात कुछ भी नही है।

ऐसा नहीं कि अब हयात कुछ भी नही है।

दिल में इस तरह से एक बिसात बिछी है

जैसे कि अब शह व मात कुछ भी नहीं है।

Thursday, February 8, 2024

ऐसा है क्या ! 16

इस दुनिया में हर कोई मेहमान है क्या!

इंसान भी इत्तफाक से इंसान है क्या!


इंसान अगर हैं तो समझना है जरूरी 

इंसानियत में कोई नुकसान है क्या!


क्यूं सामने उसके सर को है झुकाना

इंसान ही तो है कोई भगवान है क्या!


करती है बसर रूह हर शख्स की जहां

ये जिस्म भी जैसे कोई मकान है क्या


तारीफ उसकी करने से ईनाम मिलेंगे 

हाकिम से ऐसा कोई ऐलान है क्या!


मालूम है दुश्मन को हर बात ही मेरी

मेरे दोस्तों में उसकी पहचान है क्या!


दिखता है ये आसमां बस एक रंग में

इसके ऊपर कोई और आसमान है क्या!

Thursday, January 25, 2024

सच ही है। 15

इसी बहाने अपने आस-पास होना।

जरूरी है कभी कभी उदास होना।


ज़मीन का होकर ज़मीन पर रहिए

मुमकिन तो नहीं है आकाश होना।


मुश्किलें गर राह में आ जाएं भी तो

वाजिब नहीं है बेवजह हताश होना।


डोर भरोसे की गर कमजोर हो गई

यकीनी है रिश्तों में फिर खटास होना।


आज की दुनिया में तो ये आम बात है

झूठ के ऊपर सच का लिबास होना।

Friday, January 5, 2024

आसार नए हैं। 14

इस रस्म-ए-सियासत के बाजार नए हैं।

नाटक तो पुराना है किरदार नए हैं।


गुजरा है कोई शायद यूं इस तरफ अभी

लगता है कि मौसम के आसार नए हैं।


अब रौनक-ए-मयखाना होगा उरूज़ पर

महफिल में आज आए कुछ यार नए हैं।


हर कोई समझता है खुद को ही बादशाह

खुल रहे अब हर तरफ दरबार नए हैं।


बिगड़ेंगे या सुधरेंगे हालात शहर के

गलियों में आज बंट रहे अखबार नए हैं।


दुश्वारियां बहुत हैं नाख़ुदा के साथ भी 

कश्ती है पुरानी बस पतवार नए हैं।


अब दूरियां उनसे मेरी कुछ और बढ़ेंगी

रिश्तों के बीच उठ रहे दीवार नए हैं।

Tuesday, January 2, 2024

निरुत्तर तुम। 13

तुम्हे सोचकर दिल मेरा 

सब कुछ कह जाता है।

सब कह कर भी शायद 

कुछ रह भी जाता है।

तुमसे उत्तर की अभिलाषा

सदा संजोए रहता है।

मन ही मन में ख्वाबों के

बीज वो बोए रहता है।

दिल मेरा जो कहता है

नि:शब्द नहीं होते।

मगर तुम्हारे उत्तर में

कुछ शब्द नही होते।


            उत्तर का पन्ना

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दुनिया की हर बात अलग

दुनिया की रीति निराली है।

प्रश्नों का पन्ना भरा हुआ

उत्तर का पन्ना खाली है।