" मदारी " ये एक शब्द जब भी सुनाई देता है या कहीं पढ़ने को मिलता है तो मन अतीत में चला जाता है। अपना स्कूली जीवन और किशोरावस्था का समय आंखों के सामने घूम जाता है। मदारी का कार्यक्रम उसके करतब के लिए कम लेकिन उसके बोलने की कला, उसकी वाकपटुता, उसकी रोचक और मनोरंजक बातों की वजह से ज्यादा प्रचलित होता था।
स्कूल के बाहर तिराहे पर एक बड़ा सा छायादार पेंड़ हुआ करता था। स्कूल की छूटी के समय वहां कोई ना कोई मदारी अक्सर अपना करतब दिखाने के लिए मजमा लगाया करता था। इस तरह के मदारी के करतब वाले कार्यक्रम पहले एक आम बात हुआ करती थी। किसी भी पेड़ के नीचे या किसी भीड़ भाड वाली जगह पर ये सब होता रहता था।
स्कूल की छुट्टी हो चुकी थी। कानों में एक डमरू और बांसुरी की आवाज सुनाई पड़ती है। कदम बरबस ही उसी तरफ चल पड़े। वहां पहुंचा तो मजमा पहले से ही लगा हुआ था। लेकिन भीड़ और बढ़े इसीलिए मदारी ने करतब शुरू नहीं किया था। लोग आते जा रहे थे, भीड़ बढ़ती जा रही थी। मैं भी एक उचित स्थान पर जा कर खड़ा हो गया। वहां से पूरी भीड़ और मदारी सब साफ साफ दिख रहे थे। भीड़ एक गोलाकार आकृति में खड़ी थी। मदारी अपने बड़े से झोले से सब जरूरी सामान निकालकर अपने सामने लगा चुका था। बांसुरी और डमरू बजाते बजाते वो बीच बीच में कभी बांसुरी को और कभी डमरू को एक नकली मानव खोपड़ी के ऊपर घुमा दिया करता था। मदारी अपना काम शुरू कर चुका था। मदारी की बातें इतनी रोचक और मजेदार रहती थीं कि बात बात पर लोग ताली बजा रहे थे। मदारी अपनी लच्छेदार बातों के बीच बीच में डमरू और बांसुरी बजाना नहीं भूलता था। खेल शुरू हो चुका था। एक से एक करतब दिखाता जा रहा था। अपने हाथ में चाकू घुसा देना। एक से दो और दो से चार सिक्के बना देना। सिक्के गायब कर देना। अपने साथ आए एक बच्चे को एक टोकरी में रखकर गायब कर देना। बच्चे को हवा में उड़ा देना। एक नकली खोपड़ी से बातें करना। और भी कई तरह के करतब दिखा रहा था। करतब तो करतब ही रहते थे, सबसे ज्यादा आनंद लोग उसके मजेदार बातों, उसकी वाकपटुता और बोलने की कला का ले रहे थे। बीच बीच में वो मदारी लगों को डरा भी देता था। वो कहता कि जो लोग बिना पैसा दिए जाएंगे उनको तरह तरह के रोग हो जायेंगे। कभी कहता कि अगर कोई बिना पैसा फेंके यहां से गया तो 51 कदम चलने के बाद गिर जाएगा।
उसकी बातें इतनी प्रभावशाली होती थीं कि लोग डर भी जाते थे और पैसा भी दे देते थे। कार्यक्रम के दौरान ही वो एक दो बार पैसे फेंकने के लिए कहता रहता था। पैसे के लिए वो जमीन पर एक चद्दर बिछा देता था। एक ही कार्यक्रम में मदारी अपने बातों के जरिए दो चरित्र निभा लेता था। कभी अपने मनोरंजक बातों से वो लोगों को हंसने और ताली बजाने के लिए बाध्य कर देता और कभी अपने प्रभावशाली बातों से पैसे ना फेकने के लिए डरा भी देता था।
एक करतब की बात वो हमेशा करता था। अपने पूरे कार्यक्रम में वो अक्सर कहता रहता था , बीच-बीच में याद दिलाता रहता था कि सब लोग आखिरी करतब देखकर ही जाएंगे। वो करतब होता था " सांप और नेवले की लड़ाई "। लोग उस आखिरी करतब " सांप और नेवले की लड़ाई " देखने के लिए अंत तक रुके रहते थे। उस आखिरी करतब तक आते आते वो लगभग सभी से पैसे वसूल कर चुका होता था।
मदारी का कार्यक्रम खत्म हो चुका था। "सांप और नेवले के लड़ाई " की बात तो वो बस यूं ही भीड़ को बांध रखने के लिए ही करता था।
इस डर से कि कहीं मैं 51 कदम चलने के बाद गिर ना जाऊं, मैने भी पचास पैसे का एक सिक्का उसकी तरफ उछाल दिया। शायद उसने "दीवार " फिल्म नहीं देखी थी वरना वो भी कह सकता था कि वो फेंके हुए पैसे नहीं उठाता। ये भी हो सकता है कि उसने फिल्म देखी हो लेकिन परिस्थितिवश ऐसा ना बोल पाया हो।
मैने सोचा कि ये मदारी तो चालू निकला। सांप और नेवले की लड़ाई शायद कोई और मदारी दिखाए। ये सोचकर वहां से चला आया। मदारी आज भी है जो सांप और नेवले की लड़ाई दिखाने के बहाने मजमा लगाते हैं।
