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Sunday, September 5, 2010

Ek chahat-Ek tammana-कहाँ हो तुम.

 













कहाँ हो तुम.

मैंने तुमको याद किया है,

ईश्वर से फ़रियाद किया है,

मेरा पूरा विश्व तुम्ही हो,

जीवन का परिदृश्य तुम्ही हो,

मेरा तो संकल्प तुम्ही हो,

जीवन का विकल्प तुम्ही हो,

तुम बिन मैं तो जी न सकूँगा,

खुद के आंसू पी न सकूँगा,

एक बार तुम ध्यान से देखो,

मेरा अपने प्रति प्यार तो देखो,

क्या मुझसे कोई आस नहीं है,

मुझ पर क्या विश्वास नहीं है,

एक बार तो आ जाओ तुम,

मुझसे मिलकर ही जाओ तुम,

अपनी तुमसे क्या कहूं मैं,

तुम ही कहो कितना सहूँ मैं,

मैं खुद से ही जूझ रहा हूँ,

आखिर तुमसे पूछ रहा हूँ,

यदि तुमको आना ही नहीं था,

मुझको यदि पाना ही नहीं था,

स्मृति में मेरे छायी क्यों तुम,

मेरे जीवन में आई क्यों तुम.

एक सहारा मौन का


अपनों के इस जहाँ में

मैं जब भी हुआ अकेला,

तुमने मुझे पुकारा.

जीवन के इस संघर्ष में,

मैं जब भी हुआ निराश,

तुम बन गए सहारा.

जब तिनका भी न मिला ,

मेरे इस डूबते भाग्य को,

तुमने दिया किनारा.

तुम्ही हो मेरे अपने,

कहने को क्या कहें,

कि सारा जहाँ हमारा.

पर एक प्रश्न है,

तुम कौन हो?

तुम मौन हो.

तुम मौन हो.

मेरी.किस्मत



किस्मत की बात करते हो अब क्या बताएं हम,
दिल कांपता है उसके हाव-भाव देखकर।

चलता है,रुकता है,चल-चल के भी रुकता है,
घबराता  हूँ मैं उसके ठौर-ठावं देखकर.।

गम के शहर से भागकर निकला हूँ अकेला,
मिल जायेगा सुकूं खुशी के गावं देखकर।

सब रास्ते हैं बंद अब जाएँ किस तरफ,
थक गया हूँ किस्मत के धूप-छावं देखकर।

लम्बा है सफर जख्म भी मिल सकते हैं मगर
रुकना ना तुम कभी भी अपने पांव देखकर।