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Saturday, November 5, 2022

लाजमी है।

 जब भी कोई आइना देखा करें।

हम भला हैं कौन ये सोचा करें।


खुद से कोई भूल गर हो जाए तो

फिर किसी को यूं ही ना कोसा करें।


बेवजह ही दिल अगर बेचैन हो

अपने में ही अपने को खोजा करें।


दर्द जब कोई सहा ना जाय तो

बहने दें अश्कों को ना रोका करें।


लाजमी है कुछ उसूल जिंदगी में

कुछ भी हो ईमाँ का ना सौदा करें।

वक्त रुकता नही

 वक्त रुकता नही है वो तो गुजर जाएगा।

मैं भी चल दूंगा साथ उसके जिधर जाएगा।


यही बेहतर है इसके साथ ही चलते रहिये

ये तो मुमकिन नहीं कि वक्त ठहर जाएगा।


अपनी तकदीर पे भी कुछ तो भरोसा रखिए

वक्त कैसा भी हो एक दिन तो संवर जाएगा।


वो जो जख्मों का कभी जिक्र भी नही करता

कोई पूछेगा तो टूटेगा बिखर जाएगा।


जिसकी आदत में है हर बात पे वादा करना

वक्त आएगा तो वादों से मुकर जाएगा।

जूही

एक कली और फूल हूं मैं।
सब के ही अनुकूल हूं मैं।
मैं निर्भर नहीं हूं रंगों पर
मुझमें अपनी भी खूबी है।
मेरी ही महक सुगंध में तो
पूरी ही वाटिका डूबी है।
जितने भी फूल धरा पे हैं 
मैं सबसे अधिक महकती हूं।
सब रंगों की भीड़ में भी
मैं बिल्कुल अलग सी दिखती हूं।
चाहे सुंदर शाम सुनहरी हो 
या फिर हो रात की खामोशी।
मेरी सुगंध ही ऐसी है
जो फैला देती मदहोशी। 
एक मोहक महक सुगंध लिए
हर आंगन की शान हूं मैं।
कुदरत को भी मिलने वाली 
ईश्वर का एक वरदान हूं मैं।
बस एक छोटी सी पुष्प हूं मैं
है सुंदर श्वेत रंग मेरा।
सब फूलों से भी अलग हूं मैं
है अपना रंग ढंग मेरा।
सब धर्मों के पूजा स्थल
सुगंध से मेरी महकते हैं।
है गर्व बहुत मुझको इसका
ईश्वर मुझसे खुश रहते हैं।
कितने ही आंगन दरवाजे 
मुझसे ही सुगंधित होते हैं।
बस एक सुगंधित पुष्प हूं मैं।
सब " जूही " मुझको कहते हैं।

अश्कों के तटबंध

 ऐसी कोई बात न हो।

आंखों से बरसात न हो।

सुख व दुख की गणना में

अश्कों में अनुपात न हो।

दिल के रिश्तों में अपने

कुछ हों ऐसे अनुबंध।

अश्क न बाहर आ पाएं

तोड़ के सब तटबंध।


हों सब ख्वाब सुनहरे।

रिश्ते भी हों गहरे।

दिल पे कभी न लग पाए

जज्बातों के पहरे।

अपने पावन रिश्तों में 

यही हो बस उपबंध।

अश्क न बाहर आ पाएं

तोड़ के सब तटबंध।