Part - 1
- मां, मेरी पढ़ाई अब पूरी हो चुकी है। बिजनेस से संबंधित कोर्स भी मैने कर लिया है। अब मैने सोच समझकर ही ये निर्णय लिया है कि मैं कोई नौकरी नहीं बल्कि अपना कोई अच्छा सा व्यवसाय करूंगा।
- ठीक है बेटा , जो तुम उचित समझो पर कोई अच्छा व्यवसाय शुरू करने में बहुत अधिक धन की जरूरत होती है। उसकी व्यवस्था करनी पड़ेगी।
- हां मां वो तो है। मैने पापा से बात की थी तो वो तैयार हैं कुछ रकम देने के लिए। मामा ने भी बोला है कुछ हेल्प के लिए। एक दो दोस्त हैं वो भी हेल्प कर रहे है। हो जाएगा सब। इलेक्ट्रानिक और बिजली से संबंधित कोई अच्छा व्यवसाय शुरू करूंगा। अगर हो सका तो किसी कंपनी की एजेंसी भी ले लूंगा।
- अच्छा ठीक है बेटा जो भी काम करना वो पूरी रीमानदारी से करना , सफलता जरूर मिलेगी।
- अरे मां, मैने तो एक अच्छी सी दुकान भी देख रखी है बाजार में और दुकान का नाम भी सोच रखा है।
- अच्छा ! जरा बता तो क्या नाम सोचा है दुकान का।
- मां, उसका नाम होगा " पूरन एजेंसीज "
बेटे के मुंह से जैसे ही मैने ये नाम सुना, एकदम चौक गई। पिता जी का यही नाम था और पिता जी ने दुकान के बोर्ड के नीचे अपने नाम को लिख रखा था " पूरन चंद्र गुप्ता "। सुनकर एक दम से पिता जी का चेहरा सामने आ गया। आंख में आंसू आ गए लेकिन आंसुओं को छुपाकर ही बेटे से बोल दिया कि अच्छा नाम है। मैने बोल दिया बेटे से कि दादा जी के नाम से एजेंसी शुरू कर रहे हो, अच्छी बात है।
बेटा चला गया लेकिन में अतीत में खो गई। यादों के पन्ने एक एक कर खुलने लगे।पिता जी की एक छोटी सी जनरल मर्चेंट की दुकान थी शहर में ही। दुकान बहुत ठीक से नहीं चलती थी पर इतनी कमाई हो जाती थी कि घर के रोजमर्रा के खर्चे बिना रुकावट के चल जांय और कुछ बचत भी हो जाय। दुकान घर से थोड़ी ही दूर पर था। कुछ ही वर्ष पहले उसे पिताजी ने सरकारी नीलामी में खरीदा था। मैं और मेरा भाई दोनो एक सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। उस दिन हम लोगों का सालाना रिजल्ट निकला था। मैं सातवें पास करके और मेरे से एक साल बड़ा भाई आठवीं पास करके अगली कक्षाओं में जाने वाले थे। चूंकि हम दोनो ही पढ़ने में बहुत अच्छे थे इसलिए पिता जी चाहते थे कि हम दोनो की आगे की पढ़ाई अब किसी इंग्लिश मीडियम वाले स्कूल में हो। पिता जी पढ़ाई को लेकर काफी गंभीर रहते थे। घर में विचार विमर्श चल रहा था कि ये सब कैसे होगा। प्राइवेट इंग्लिश मीडियम स्कूलों की फीस बहुत महगी होती थी। दुकान से इतनी कमाई तो थी नहीं पर पिताजी अडिग थे कि कुछ भी करना पड़े लेकिन बच्चे इंग्लिश मीडियम स्कूल में ही पढ़ेंगे। पिता जी इसी तरह के एक स्कूल में एडमिशन की बात करके आए तो थोड़ा निराश थे। मां से ही बातें कर रहे थे वो।
- मैं बात करके आया हूं , स्कूल में पढ़ाई बहुत मंहगी है। हम कुछ भी कर लें लेकिन दोनो बच्चों को तो नही पढ़ा सकते।
मां बोली - तो अब क्या करना है। कैसे होगा फिर ?
मां और पिता जी दोनो ही बड़े असमंज में थे। फिर निर्णय यही हुआ कि लड़का यानी मेरा भाई इंग्लिश मीडियम में पढ़ेगा और मैं सरकारी स्कूल में ही पढ़ूंगी। मां और पिता जी जाने क्या सोचा और ये निर्णय ले लिया। मेरा भी बहुत मन था कि मैं भी इंग्लिश मीडियम वाले स्कूल में पढूं पर घर की स्थिति और माता पिता के परेशान चेहरों को देख मैं भी कुछ नहीं बोल पाई। मेरी उम्र ज्यादा नहीं थी पर इतनी समझ तो थी ही कि घर की परेशानियों को समझ सकूं। मैने ये जाहिर नहीं होने दिया कि मैं थोड़ा दुखी हूं और खुशी खुशी परिवार के निर्णय के साथ खड़ी हो गई। शायद ये मेरे समझौते या त्याग की पहली किस्त थी जो मैंने भरी थी। मुझे इस बात का आभास नहीं था कि पूरे जीवन में कब तक और कुल कितनी किश्तें भरनी होंगी। भाई का नौवीं कक्षा मे एडमिशन हो गया। उसके लिए नए स्कूल ड्रेस , जूते , बस्ता , पानी की बोतल , कापी किताब और अन्य कुछ चीजें आईं। मेरे लिए बस किताब कापियां ही नई आईं बाकी सब तो वही रहा। कुछ नए की जरूरत भी नहीं थी। सब कुछ देखकर अच्छा भी लग रहा था पर इस बात का एहसास था कि मैने एक समझौता किया है खुद से। मैं सोच रही थी कि अगर मैं ना होती और मेरे घर में दो बेटे ही होते तो पिता जी क्या करते , क्या उस समय भी पिता जी एक को ही इंग्लिश मीडियम में पढ़ाते। अगर नही तो इसका मतलब मुझे बेटी होने की कीमत देनी पड़ रही है इस समझौते के रूप में।
Part -2
फिर वो दिन भी आया जिस दिन भाई को स्कूल जाना था। सुबह से ही पूरा परिवार अति उत्साह से भरा था। सब तैयारी में जुटे थे। मां टिफिन बनाने में व्यस्त पिता जी उसे तैयार करने और बस्ता लगाने में व्यस्त। नया नया खूब अच्छा सा स्कूल ड्रेस पहनकर भाई तैयार हो चुका था। कहने की जरूरत नहीं कि बहुत ही सुंदर लग रहा था। मैं उसे एक टक देखती रही।
मैने थोड़ी सी चुटकी भी ली उसकी
- उफ्फो ! क्या बात है , बहुत अच्छे लग रहे हो।
भाई भी थोड़ा मुस्करा दिया पर कुछ बोला नही। मैं मन ही मन सोच रही थी कि अगर मेरा भी एडमिशन उस स्कूल में हुआ होता तो मैं भी तैयार होकर आज नए स्कूल जाती। मेरे लिए भी नए नए स्कूल ड्रेस आदि सब आते। पर मन की बात मन में ही रखी मैंने वरना शायद पिता जी को कष्ट होता। स्कूल घर से बहुत दूर नहीं था पर पहला दिन था इसलिए पिता जी ने भाई से कहा
- देखो , कुछ दिन तो मैं तुम्हे स्कूल छोड़ आया करूंगा और दुकान से समय निकाल कर ले भी आया करूंगा, बाद में तुम खुद ही साइकिल से आया जाया करना।
भाई ने भी हामी भर दी। घर से निकलते समय मां ने भाई का तिलक किया। परिवार के लिए बड़ा दिन था उस दिन। पिता जी उसे स्कूल छोड़ कर आ गए। दोपहर में दुकान से समय निकाल कर उसे ले भी आए। फिर देर रात तक स्कूल की ही बातें होती रहीं। पहला दिन कैसा रहा , क्या क्या हुआ , कौन कौन से टीचर पढ़ाएंगे , दोस्त यार , यही सब चलता रहा।
मैं भी सब सुनती रही। दूसरा दिन भी आया और फिर पिता जी का उसे स्कूल छोड़ना फिर दोपहर में लाना और फिर कुछ देर तक स्कूल की बातें और शाम को पढ़ाई। यही क्रम सा बन गया था रोज का।
उसके पांच छह दिन बाद मेरा स्कूल भी खुल गया। मेरा स्कूल भी घर से बहुत दूर नहीं था। मैं साइकिल से खुद ही चली जाती थी। मेरे स्कूल जाने में कुछ नया नहीं था। सब कुछ हर वर्ष जैसा ही था इसलिए कुछ खास उत्साह जैसा नहीं दिखा घर में। मैं ही थोड़ा उत्साहित थी कि नया और एक दर्जा बड़ा क्लास होगा।
मैं सामान्य रूप से हर वर्ष की तरह तैयार हुई , मां ने नाश्ता बनाकर मेरा लंच बॉक्स दिया और मैं स्कूल चली गई।
एक वर्ष बीत गया। मेरा रिजल्ट हमेशा की तरह अच्छा रहा। मेरे रिजल्ट से परिवार में सब वैसे ही खुश थे जैसे हर वर्ष रहते थे। भाई का रिजल्ट अच्छा नहीं था। लगभग सभी विषयों में उसके नंबर खराब ही आए थे। मां और पिता जी थोड़ा निराश थे पर आशान्वित भी थे कि कोई बात नही ! नया स्कूल , नया पाठ्यक्रम और मीडियम भी बदल गया था इसलिए ऐसा हो गया होगा लेकिन धीरे धीरे अच्छा हो जाएगा। भाई भी दुखी था तो सब ने मिलकर उसे समझाया।
समय अपनी गति से चलता रहा। देखते ही देखते कुछ वर्ष बीत गए। भाई अब बारहवीं में और मैं ग्यारहवीं कक्षा में आ गए थे। सब कुछ संतोष जनक ही चल रहा था। पिता जी की दुकान भी पहले से अच्छी चलने लगी थी। भाई की पढ़ाई में भी सुधार आ चुका था। वो अपनी कक्षा में अच्छे और पढ़ाकू बच्चों में
शुमार हो गया था। मेरा भी सब अच्छा ही था पहले की तरह ही। फरवरी का महीना आ चुका था। हम दोनो अपने परीक्षा की तैयारी में जुट गए। भाई की बारहवीं बोर्ड की परीक्षा थी इसलिए वो ज्यादा मेहनत कर रहा था। बारहवीं के बाद उसे कालेज में जाना था। बहुत उत्साहित था वो। मुझे भी ग्यारहवीं पास करके बारहवीं में जाना था, उत्साह मुझे भी था।
करते करते मार्च और अप्रैल का महीना भी आ गया। हम दोनो की परीक्षाएं भी खत्म हो गईं। भाई की बोर्ड की परीक्षा में सभी पेपर अच्छे हुए थे, ऐसा उसने बताया था। मेरे भी अच्छे हुए थे। बस अब रिजल्ट की इंतजारी थी। रिजल्ट के बाद भाई की पढ़ाई एक नया मोड़ लेने वाली थी। शहर में एक ही डिग्री कालेज था इसलिए उसमे एडमिशन की भी बहुत मारा मारी रहती थी। लेकिन भाई पढ़ने में अच्छा था इसलिए अच्छे रिजल्ट की उम्मीद थी। रिजल्ट अच्छा आएगा तो एडमिशन तो हो ही जाएगा, ऐसी उम्मीद थी।
Part - 3
यही सब पुरानी बातें सोचते सोचते ना जाने कब नींद लग गई। बेटे ने अपने एजेंसी का नाम मेरे पिता जी यानि अपने दादा के नाम रखने की बात करके मुझे यादों के समंदर में भेज दिया था जिसमे उठती गिरती ना जाने कितनी लहरें थीं। आंख खुली तो देखा कि दीपक के पिता जी आ गए थे। बेडरूम से किचन साफ दिखता था मैने देखा कि वो किचन में चाय बना रहे थे।
मुझे जगा देखकर वो बोले
- उठ जाओ , मैने चाय बना ली है। तुम सो रही थी और कुछ तबियत भी ठीक नहीं लग रही दो तीन दिनों से, तो मैंने तुम्हे जगाया नहीं। चलो चाय पीते हैं बरामदे में साथ बैठ के।
- अच्छा, ठीक है आ रही हूं मैं। दीपक नही दिख रहा , कुछ मालूम है आपको कि कहां गया होगा। अभी दोपहर में तो घर पर ही था।
- हां, मुझे फोन किया था उसने और बोला था कि पापा मैं थोड़ा देर से लौटूंगा। खाने के समय तक आ जाऊंगा। अपने एजेंसी के काम में व्यस्त होगा। आ जाएगा , परेशान होने की जरूरत नहीं है।
- अच्छा ठीक है, भगवान उसे सफल करे अपने काम में। आपने कपड़े नही चेंज किए, कहीं जाना है क्या ?
- हां , में अपने एक दोस्त से मिलने जा रहा हूं थोड़ी देर में आ जाऊंगा।
वो चले गए और मैं वापस कमरे में आ गई। सामने की दीवार पर पिता जी की तस्वीर लगी थी। उसे देखकर एक बार फिर आंखें भर आईं।
यादों का सिलसिला जो चल निकला था , मेरा मन किया कि उसी में को जाऊं। जैसे कोई फिल्म देख रही थी कि उसे अधूरा नहीं छोड़ा जा रहा था। यूं ही बैठे बैठे एक बार फिर अतीत में खो गई। यादों की अगली कड़ी काफी दुखद थी।
लोगों से सुना था कि समय एक सा कभी नहीं रहता। उस दिन सुबह पिता जी रोज की तरह ही दुकान जाने को तैयार हुए। काफी निश्चिंत थे। इधर कुछ दिनों से वो काफी खुश रहते थे। भाई और मेरी पढ़ाई बहुत अच्छी चल रही थी इस बात से उन्हें काफी सुकून था। वो नाश्ता करके दुकान के लिए निकल गए। हम सब भी अपने अपने काम में लग गए। अभी कुछ मिनट ही बीते होंगे कि मोहल्ले का ही एक लड़का भागा भागा आया और बताया कि पिता जी रास्ते में गिरे पड़े है और उनकी तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही। हम सबको जैसे सांप सूंघ गया। किसी अनहोनी के डर से हम सब घबरा गए। दोनो भाई बहन और मां सब उधर ही दौड़ पड़े। वहां पहुंचने पर पता लगा कि कुछ लोग जो उन्हें जानते थे उन्हें उठाकर अस्पताल ले गए। हम लोग भी आटो से अस्पताल की ओर चल दिए। मां के आंख से आसुओं की धारा बह चली थी। हम लोग भी कब तक रोक पाते खुद को। पिता जी का चेहरा याद कर और किसी अनहोनी के डर से आंखों से आंसू बह चले।
कुछ ही देर में हम लोग अस्पताल पहुंच गए। बाहर ही कुछ जान पहचान वाले मुहल्ले के लोग दिखे पर वो कुछ बोले नहीं। हम सब सीधे इमरजेंसी वार्ड में गए। वहां पहुंचकर देखा तो सन्न रहे गए। जहां खड़े थे वहीं बैठ गए फर्श पर। सब कुछ लुट चुका था। पिताजी का शरीर सफेद कपड़ों से पूरी तरह ढका हुआ था। मुहल्ले के दो चार लोग वहीं थे। खबर जानकार कुछ महिलाएं भी आ गईं थीं। सब लोग हम लोगों को पकड़कर सांत्वना देने लगे। मां का बुरा हाल था रो रो कर। हम लोग भी रोए जा रहे थे और मां को संभाल भी रहे थे। क्या करें क्या ना करें कुछ समझ में नहीं आ रहा था।कुछ शुभचिंतकों की मदद से पिता जी के शव को घर लाया गया। बहुत विकट स्थिति थी। रिश्तेदारों को खबर कर दिया गया। शाम तक काफी रिश्तेदार और मुहल्ले के लोग आ चुके थे। समय से नदी घाट ले जा कर दाह संस्कार कर दिया गया।
दूसरे दिन तक सभी रिश्तेदार जा चुके थे। मुहल्ले के लोगों का आना जाना लगा था। सभी लोग ढाढस बंधा रहे थे। पूरे घर की परिस्थिति बदल चुकी थी। यूं ही रोते बिलखते बारह दिन बीत गए। सभी के सहयोग से तेरहवीं की रस्म भी हो गई। मुहल्ले के लोगों का आना जाना भी कम हो गया। पूरा दिन बीत जाता पर मां कुछ नही बोलती। हम लोग बेहद परेशान थे। समय बीतता रहा , स्थितियां धीरे धीरे सामान्य हो रही थीं। हम बच्चों को देख कर मां में भी हिम्मत आ रही थी। वो भी खुद को सामान्य करने का प्रयास कर रही थी। पिता जी की कमी बेहद खल रही थी सब को। अजीब लग रहा था घर का माहौल बिना पिता जी के।
Part - 4
मेरा रिजल्ट आ गया और मैं अच्छे नंबरों से पास हो गई। अब मुझे बारहवीं में पढ़ना था। थोड़े दिन बाद भाई का बोर्ड परीक्षा का रिजल्ट भी आ गया। बहुत अच्छे नंबर मिले थे उसे सभी विषयों में। रिजल्ट देखते ही मां रो पड़ी , बोली कि आज पिता जी होते तो कितना खुश होते। काफी सोच विचार और हिम्मत करके भाई को इंग्लिश मीडियम स्कूल में नाम लिखा के अच्छी शिक्षा का देने का सपना पूरा होते देख वो बहुत खुश होते।
पिता जी की दुकान उनके ना होने से कई दिनों से बंद पड़ी थी। अजीब सी कशमकश में थे हम सभी कि दुकान पर अब कौन बैठे और कौन संभाले उसे। दुकान चलना भी जरूरी था। वो दुकान ही आय का एक स्रोत था। उसी की आय से घर का खर्चा और हम भाई बहनों की पढ़ाई भी चल रही थी। भाई का बिल्कुल ही मन नहीं था दुकान पर बैठने का। वो अपनी पढ़ाई को लेकर गंभीर था। भविष्य में भी वो पढ़ाई के बाद कोई नौकरी ही करना चाहता था , व्यापार में उसे कोई लगाव नहीं था। लेकिन दुकान चलना भी जरूरी था।
मुझे कुछ आभास सा होने लगा कि शायद मेरे समझौते और त्याग की अगली किश्त का समय आ गया है। हुआ भी यही , सब मुझे समझाने लगे कि तुम्हारे विषय भी ऐसे है कि प्राइवेट पढ़ाई हो सकती है इसलिए दुकान की जिम्मेदारी तुम ले सकती हो। कुछ दिन तक थोड़ा अजीब सा लगेगा, कुछ लोगों की बातें भी सुननी पड़ सकती है पर धीरे धीरे समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। सब मुझे समझाते और मनाते रहे , में सुनती रह। सुनने के अतिरिक्त और कर भी क्या सकती थी। घर की परिस्थिति ऐसी नही थी कि मैं कुछ बोलूं। जिस तरह भाई ने अपनी नामंजूरी जाहिर कर दी थी वैसे मैं भी कर सकती थी पर स्वभाव में ही ऐसा नहीं था मेरे। सब कुछ चुपचाप सुन लेने की कीमत भी अदा करनी होती है। वही कर रही थी मैं। फिर यही तय हुआ कि मैं स्कूल ना जाऊं , घर पर ही पढूं और प्राइवेट फॉर्म भरकर परीक्षा दे दूं। दुकान पर मैं ही बैठूं और मेरी सहायता के लिए एक नौकर रख लिया जाय जो दुकान चलाने में मेरी सहायता करेगा। इस निर्णय पर समझौता करना मेरे लिए बहुत ही बड़ी बात थी। मैं पढ़ने में अच्छी थी , मुझे लगाव भी था अपनी शिक्षा से। प्राइवेट फॉर्म भर के परीक्षा देना , इसे
अधिकारिक मूल्य तो है पर सामाजिक मूल्य बहुत कम । ऐसी शिक्षा में ये मान लिया जाता था कि पढ़ने वाला अच्छा नहीं होगा पढ़ने में और ये एक औपचारिक शिक्षा ही है जो कि सिर्फ डिग्री या पास होने का प्रमाण पत्र लेने के लिए ही किया जाता है जबकि मेरे लिए ये दोनो बातें गलत थी। मैं पढ़ने में अच्छी भी थी और शिक्षा का मूल्य भी मुझे पता था। मैं जीवन में शिक्षा के बल पर ही कुछ करना चाहती थी। मन ना होते भी मुझे किराने की दुकान पर बैठना बहुत ही नागवार गुजर रहा था , शहर बहुत छोटा था , लोगों की बातें सुननी पड़ती वो अलग। भाई ने पूरी तरह से मना कर दिया था पहले ही। अंत में परिवार की स्थिति देखकर और पिता जी को ध्यान में रखकर मुझे मानना ही पड़ा।
मैं दुकान जाने लगी। मुहल्ले का ही एक नौकर भी रख लिया गया। सब बहुत अजीब लग रहा था। मैने सोचा था कि लोगों की बातें सुननी पड़ेगी पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। छोटा सा शहर था , लोगों को जब पिता जी के बारे में पता लगा और जब वो जान पाए कि मैंने किस परिस्थिति में दुकान पर बैठने का फैसला किया है तो लोग ताने देने के बजाय मेरी प्रशंसा ही करने लगे। लोगों को जब ये पता लगा कि पढ़ाई में बहुत अच्छी हूं और दुकान के साथ साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखूंगी तो सब और भी प्रभावित हुए मुझसे।
धीरे धीरे सब कुछ सामान्य होने लगा। मैं दुकान जाने लगी , दुकान बहुत अच्छे से चलने लगी। एक नौकर था उससे बहुत सहायता मिल जाती थी। भाई कालेज जाने लगा। मैं भी शाम को दुकान से लौटने के बाद अपनी पढ़ाई कर लेती थी। दिन में भी मैं दुकान पर अपनी किताबें ले जाती थी , समय मिलने पर कुछ वहां भी पढ़ लेती थी क्योंकि प्राइवेट फॉर्म भर के बोर्ड की परीक्षा तो देनी ही थी। मां भी सब सामान्य से चलता देख संतुष्ट थी। कभी कभी पिता जी को याद कर के मां दुखी हो जाती थी पर हम भाई बहनों को देख कर सामान्य हो जाती थी।
परीक्षा फॉर्म भरने का समय आ गया। मैने प्राइवेट फॉर्म भर दिया इंटरमीडिएट बोर्ड परीक्षा का। परीक्षा की तैयारी करने लगी। दुकान का काम भी अच्छा चल रहा था। दुकान में मैने पिता जी की एक तस्वीर लगा रखी थी भगवान की तस्वीर के साथ ही। पिता जी की फोटो देख अक्सर आंखें भर आती थीं। दुकान में रोज सुबह भगवान को फूल अर्पित करने के साथ पिता जी को भी फूल अर्पित करके उन्हे याद कर लेती थी। अगर मेरी पढ़ाई को अलग कर दिया जाय तो ऐसा लगता था कि मैं पिता जी की ही भूमिका में हूं परिवार के लिए। बोर्ड परीक्षा का समय आ गया। भाई का भी स्नातक पहले वर्ष की परीक्षा का समय आ गया। मैने दुकान जाने के समय में थोड़ी कटौती कर दी जिससे परीक्षा अच्छे से दे सकूं। इस बात का मन ही मन बहुत कष्ट होता था कि लगभग एक वर्ष पूरा होने को था लेकिन भाई एक बार भी दुकान नहीं गया। दुकान पर बैठने की छोड़ो वो उसे देखने तक नहीं गया कि कैसा है सब कुछ पिता जी के बिना। एक दो बार मैने इस बात की चर्चा भी की घर में पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। मां भी भाई का ही पक्ष लेती थी। मन ही मन बहुत दुख होता था। कभी कभी ऐसा लगता था कि सब अपने स्वार्थ में लगे हैं। मैं दुकान जाती रहूं , पैसा आता रहे , घर ठीक से चलता रहे , भाई की पढ़ाई ठीक से चलती रहे बस। किसी ने कभी भी ये नही पूछा कि मेरी पढ़ाई कैसी चल रही है लेकिन अगर किसी दिन दुकान जाने में देर होने लगे तो मां और भाई दोनो ही एक ना एक बार पूछ लेते कि मुझे आज दुकान नहीं जाना है क्या। मैं घर में सबसे छोटी थी पर इसका ख्याल सिर्फ मुझे ही था। वैसे तो सब साथ बैठते थे , बातें होती थीं , सब कुछ एक परिवार की तरह ही चल रहा था पर मैं अपने आप को कुछ उपेक्षित सा महसूस करने लगी। ये बात मेरे दिमाग में घर करने लगी कि सबसे छोटी होते हुए भी पूरे परिवार की जिम्मेदारी मेरे ऊपर ही क्यों है। मेरी उम्र 17 या 18 साल ही रही होगी पर मैं सब कुछ समझने लगी थी। दुकान पर बैठने और तरह तरह के लोगों से मिलने की वजह से मैं अपनी उम्र के हिसाब से अधिक ही समझदार और परिपक्व हो चुकी थीं।
Part - 5
यादों का भीअपना एक स्वभाव होता है वो अनायास ही आते रहते हैं पर में कभी कभी खुद भी अतीत में खो जाती हूं। मेरा भी अपना स्वभाव है , मुझे अच्छा लगता है कभी कभी अतीत में खो जाना। भूले बिसरे बातों को , और अपने लोगों को याद करना जो आज अपने बीच नहीं है कभी कभी सुख देता है और कभी कभी दुख भी। सुख और दुख दोनो की अनुभूति होती रहे ये आवश्यक भी है , इससे संवेदनाओं में संतुलन बना रहता है।
मैं यादों से बाहर आ चुकी थी उन्हे अधूरा ही छोड़ कर। यादों में जाते जाते मुझे लत सी हो गई थी इसकी। तभी काल बेल की घंटी बजी। जाकर दरवाजा खोला तो राहुल जी थे। वो अंदर आए , आते ही पूछा
- दीपक नही आया क्या अभी ?
- नही , अभी नहीं आया। बोल के गया था कि खाने के समय के पहले आ जाएगा। आ ही रहा होगा।
तब तक काल बेल फिर बजा। मैने जाकर दरवाजा खोला तो दीपक ही था।
- बड़ी देर कर दी बेटा ?
- हां मां , थोड़ी देर हो गई।
- कोई बात नहीं , जा कर हाथ मुंह धो ले और अपने पापा से भी बोल दे। मैं खाना निकाल रही हूं। सब लोग खाना एक साथ ही खाते थे। खाना खाकर मैने मां से और भाई से थोड़ी देर बात की। मैं रोज ही रात में अपनी मां से बात कर लेती थी। उम्र हो गई थी , बीमार भी रहने लगी थीं इसलिए चिंता लगी रहती थी। वैसे भाई था उनके साथ देख भाल के लिए पर फिर भी मां की चिंता तो स्वाभाविक ही है। खाना वाना खा कर सब लोग सोने लगे पर मेरी नींद गायब थी ना जाने क्यों। ऐसा लग रहा था जैसे कोई फिल्म देख रही थी और बीच में ही छोड़ दिया है।
सब सो गए और मैं फिर अतीत में खो गई।।
मेरी और भाई दोनो की परीक्षा खत्म हो गई। हमेशा की तरह इस बार भी पेपर ठीक ही हुए थे। भाई का स्नातक प्रथम वर्ष पूरा हो रहा था। मेरा इंटरमीडिएट पूरा हो रहा था। अगले महीने ही रिजल्ट आने के बाद मुझे भी स्नातक में प्रवेश करना था। पर जिस तरह से घर का माहौल चल रहा था उस तरह मुझे तो प्राइवेट ही पढ़ना था। मैं भी मानसिक रूप से तैयार थी इस बात के लिए , इसके अतिरिक्त कोई दूसरा रास्ता भी नही था। इसी में सबकी भलाई थी। वैसे भी जब इंटरमीडिएट प्राइवेट पढ़ लिया तो स्नातक पढ़ने में क्या दिक्कत थी।
मेरा रिजल्ट आ गया इंटरमीडिएट परीक्षा का पर आशा के अनुरूप नहीं आया इस बार। श्रेणी तो प्रथम ही थी पर नंबर बहुत अच्छे नहीं थे। कुछ दिनों बाद भाई का रिजल्ट आ गया। दोनो भाई बहन अगली कक्षा में जाने को तैयार थे। भाई का एडमिशन स्नातक द्वितीय वर्ष में हो गया लेकिन मेरा क्या मुझे तो दुकान देखना था और समय आने पर स्नातक प्रथम वर्ष का प्राइवेट फॉर्म भरना था। मैने भी मन ही मन तैयारी कर ली। विषयों का चयन कर के किताबें आदि भी ले लीं। पढ़ाई भी शुरू कर दी। मन में आत्म विश्वास भरा हुआ था। शिक्षा तो शिक्षा है चाहे प्राइवेट ही क्यों ना हो।
समय यूं ही चलता रहा। भाई का ग्रेजुएशन पूरा हो गया। उसे सरकारी नौकरी का मन था इसलिए वो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लग गया। मैं भी ग्रेजुएशन के आखिरी साल में आ गई थी। प्राइवेट ही सही पर मेरी पढ़ाई सही चल रही थी , नंबर भी ठीक आ रहे थे। मां भी खुश थी। सब कुछ अच्छा चल रहा था।
Part - 6
रोज की दिनचर्या में मुझे आभास भी नही हुआ कि मेरे दिल पर किसी और दिल ने दस्तक देना शुरू कर दिया है। दिल को एक ऐसी अनुभूति होने वाली है जो पहले कभी नहीं हुई। शायद ये जरूरी भी था क्योंकि जिंदगी बस एक ही ढर्रे पर चली जा रही थी।
दुकान के समय हमेशा यही होता था कि लोग सामान लेने आते , नौकर सामान दे देता और भुगतान और अतिरिक्त लेखा जोखा मैं देख लेती थी। सब लोग मुझे पहले से जानते थे इसलिए किसी ने कभी कोई औपचारिकता नही की। बस यूं ही कभी कभी दो चार लोग मेरी और परिवार का हाल चाल पूछ लेते थे। किसी ने मेरे से व्यक्तिगत रुचि नहीं दिखाई कि मेरी पढ़ाई कैसी चल रही है , में पढ़ रही हूं या पढ़ाई छोड़ दी , भविष्य में क्या प्लान है मेरा या परिवार का , ये सब पूछने में किसी ने कभी कोई रुचि नहीं दिखाई। मेरा खुद का स्वभाव भी शांत ही था। बस पढ़ने और थोड़ा बहुत गाने सुनने का शौक था। पुरानी फिल्मों के मधुर गीत और गजलें सुनना बहुत अच्छा लगता था, समय मिलने पर सुनती भी थी।
एक दिन दोपहर के बाद का समय था , पच्चीस छब्बीस साल का एक लड़का कुछ सामान खरीदने आया। सांवला रंग और सामान्य सी कद काठी का था। कुल मिलाकर पूरा व्यक्तित्व बहुत आकर्षक तो नही लेकिन अच्छा था। नौकर ने सामान निकाल के दे दिया फिर मुझे वो पैसे देने लगा तो थोड़ा आश्चर्य में था। मुझे लगा कि एक लड़की को दुकान पर बैठा देख वो कुछ ताज्जुब कर रहा होगा और था भी कुछ ऐसा ही। वो कुछ बोला नहीं और मुझे पैसे देकर चला गया। उस लड़के को इससे पहले कभी नहीं देखा था। मेरे दुकान पर वो पहली बार आया था। मुहल्ले में भी कभी नहीं दिखा था। मुहल्ले के लगभग सभी लोग परिचित थे। मैने सोचा कि शायद किसी के घर मेहमान होगा। और बात आई गई हो गई।
मेरे परीक्षा की तिथि नजदीक आ रही थी। मैं दुकान से लौट कर थोड़ा आराम कर पढ़ाई करने लगती थी यही रोज का क्रम था। मैने खुद को समझाया कि मैं कुछ भी इधर उधर ना सोचूं और अपनी पढ़ाई पर ध्यान दूं।
कुछ दिन बाद वो लड़का फिर आया कुछ सामान लेने। नौकर को सामान का लिस्ट देने के बाद थोड़ी देर तो चुपचाप ही खड़ा था लेकिन फिर मुझसे बात करने लगा
- इतनी कम उम्र में दुकान संभाल रही हो, देखकर ताज्जुब हो रहा है।
- ताज्जुब होने वाली कोई बात नही है , परिवार की परिस्थिति ही कुछ ऐसी थी कि मुझे दुकान संभालना पड़ा।
- पर तुम्हारी उम्र अभी पढ़ाई करने की है। किस क्लास तक पढ़ी हो ? पढ़ाई क्यों छोड़ दी ?
- ऐसा कुछ नहीं है। पढ़ाई भी कर रही हूं। ग्रेजुएशन का अंतिम वर्ष है , प्राइवेट फॉर्म भरा है।
- अच्छा , ये तो बहुत अच्छी बात है।
- पढ़ाई और दुकान के अलावा और क्या रुचियां हैं तुम्हारी ?
- कुछ खास नहीं , बस पढ़ना और अच्छी संगीत सुनना जैसे पुराने गाने , गजलें बस यही सब।
- अच्छी बात है। मेरी भी रुचियां लगभग यही हैं।
तब तक कुछ और भी ग्राहक आ गए बातचीत बंद करके मैं दूसरे ग्राहकों को देखने में लग गई। थोड़ी ही देर में उसने काफी कुछ जानकारी ले ली मेरे बारे में। वो पूछता रहा मैं बताती रही। मेरे बारे में , मेरी शिक्षा और मेरी रुचियों के बारे में सब जानकारी ले ली उसने थोड़ी ही देर में। उसके बोलने और पूछने का ढंग बहुत ही अच्छा था। एक शिक्षित और सभ्य व्यक्ति का लग रहा था। आवाज में बहुत मिठास और आत्मीयता थी। कम समय में वो जितना भी जान पाया मेरे बारे में उससे वो बहुत प्रभावित था मुझसे। आज बहुत समय बाद किसी ने इतनी आत्मीयता से पूछा और बातें की थी मुझसे। उसका सारा सामान नौकर निकाल चुका था। वो मुझे पैसे देकर चला गया। शाम को दुकान बंद करके घर पहुंची। थोड़ा आराम करने के बाद मैं यूं ही बैठी तो ना जाने क्यों उस लड़के का चेहरा ही दिमाग में आता रहा। उसने क्या क्या पूछा और मैने उसका क्या क्या उत्तर दिया यही सब दिमाग में चलता रहा। अपने दिए हुए उत्तरों का मूल्यांकन भी चल रहा था दिमाग में कि मेरे उत्तर उसके प्रश्न के अनुरूप थे या नहीं , पर्याप्त थे या नहीं। मां और भाई तो टीवी देखने में व्यस्त थे। मैं भी वहीं बैठी थी। आंखें तो मेरी भी टीवी पर ही थीं पर दिल और दिमाग कहीं और ही था। मुझे कुछ विचलित और गंभीर देख कर मां ने मेरी तरफ देखा पर कुछ बोली नहीं। मैं सोच रही थी कि उस लड़के ने तो मेरे बारे में थोड़ी बहुत जानकारी ले ली पर मैं नहीं जानती उसके बारे में कुछ भी। मैने सोचा कि मुझे भी पूछना चाहिए था। यही सब दिमाग में चल रहा था। उसने भी अभी मेरे परिवार के अन्य सदस्यों के बारे में कुछ नही पूछा था। पर मैं क्यों सोच रही थी ये सब ?उसने पूछा , नही पूछा , मैने भी कुछ नही पूछा , क्या फर्क पड़ता है इन सबसे। उसके पास कुछ खाली समय था तो उसने थोड़ी बात कर ली मुझसे , इसमें क्या खास बात है। उसकी थोड़ी सी औपचारिकता को मैं इतनी गंभीरता से क्यों ले रही हूं ? यही सब प्रश्न मेरी दिमाग में आ रहे थे। रात में खाना खाने के बाद , यही सब सोचते सोचते मैं सो गई।
अगले दिन जब मैं दुकान जाने लगी तो ना जाने क्यूं मन किया कि कपड़े थोड़े अच्छे पहन लूं। कुछ ऐसा कर लूं कि कल से अच्छी दिखूं। मुझे अपने आप में ऐसे परिवर्तन पहले कभी नहीं दिखे। थोड़ा तैयार होकर मैं दुकान चली गई रोज की तरह। दुकान रोज की तरह चलने लगी। लोग आते रहे , नौकर सामान देता रहा , में पैसे लेती रही , सब कुछ रोज की तरह। एक परिवर्तन सा दिख रहा था मुझे खुद में। ऐसा लगा कि आंखों को इंतजार है किसी का। दिल भी साथ नहीं दे रहा था। कुछ अनमना सा देख नौकर को लगा कि मेरी तबियत ठीक नहीं है। वो बोला
- दीदी, तबियत ठीक नहीं है क्या ? सर दर्द हो तो दवा ला दूं कोई।
- अरे नही, ऐसा कुछ नही है। थोड़ी थकान है पर दवा की जरूरत नहीं है , ठीक हो जाएगा।
उसने मुझे दुकान बंद कर देने को कहा पर ऐसा कुछ था ही नहीं , तबियत तो ठीक ही थी। वास्तविक कारण नौकर को क्या मालूम और मैं भी उसे क्या बताऊं।
पूरा दिन बीत गया। आंखों को जिसका इंतजार था , वो नही आया। दुकान बंद किया और घर वापस आ गई। किसी चीज में मन नहीं लग रहा था। चाय पीकर मैंने मां से बोला कि थोड़ी थकान है और अपने कमरे में आ गई। खुद ही परेशान होकर खुद को ही सांत्वना दे रही थी। कोई रोज रोज क्यों आएगा दुकान पर , किसी चीज की आवश्यकता होगी तभी तो आयेगा खरीदने , और वो था ही कौन , एक ग्राहक ही तो था , फिर मैं क्यों इतनी परेशान हूं , क्यों इतनी बेचैन हूं। सोचते सोचते रामधारी सिंह "दिनकर" जी की पंक्तियां याद आ गईं जो मैने पढ़ी थी किसी किताब में।
" रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है। "
पंक्तियां याद कर चेहरे पर हल्की सी हंसी आ गई। मेरी उस हल्की सी हंसी ने बेचैनी कुछ कम कर दी। खाना वाना खाकर सो गई।
सुबह हुई और दुकान जाने का समय हो गया। मैने महसूस किया कोई बेचैनी नहीं है मुझे। सब सामान्य और एक हल्कापन लग रहा था लेकिन इतना तो परिवर्तन दिखा कि थोड़ा अच्छे से तैयार हो कर जाने का मन कर रहा था। अच्छे से तैयार हुई और दुकान चली गई।
आज रविवार था , इस दिन कस्टमर कुछ ज्यादा रहते हैं। दोपहर का समय रहा होगा कि वो लड़का आज फिर दुकान पर आया कुछ सामान लेने। जब पैसे देने लगा तो आज मैने खुद ही उससे पूछ लिया उसके बारे में। बातचीत में उसने बताया कि वो वहीं दुकान के पास ही किसी मकान में किराए पर रहता है। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद एक सरकारी स्कूल में गणित विषय के अध्यापक पद पर न्युक्ति हुई थी। वो रहने वाला पड़ोसी जिले का था। उसका स्कूल शहर से बाहर 5-6 किलोमीटर दूर एक गांव में था इसलिए वो यहीं एक मकान लेकर रहता था और रोज यहीं से स्कूल आया जाया करता था। आज रविवार था इसलिए उसकी छुट्टी थी। अमूमन दोपहर के समय कस्टमर कम रहते हैं। कोई और कस्टमर नहीं था इसलिए इतनी बातें हो गईं। नौकर भी सब बातें सुन रहा था। उस दिन जब वो मेरे बारे में पूछ रहा था तब भी नौकर ने सब सुना था। आज भी जब हम दोनो को बातें करते सुना तो थोड़ा आश्चर्य लग रहा था उसे क्योंकि आज से पहले कभी भी उसने किसी से भी इतना बात करते नही देखा था। वो कुछ बोला नहीं। दो दिन बात हुई और हम दोनो लोग एक दूसरे के बारे में थोड़ा बहुत जान गए थे। बातें हुई और वो चला गया।
आज मन बहुत प्रसन्न था। इतनी आत्मीयता से बातें हुईं जितनी कि परिवार में भी कभी किसी से नहीं हुईं। जाने कब से समझौते ही तो करती आई हूं। मेरी खुशियों के बारे में किसी ने कभी नही सोचा। आज जब किसी ने आत्मीयता दिखाई तो चेहरे और मन में खुशी के भाव स्वाभाविक ही थे। दुकान बंद करने का समय हुआ। दुकान बंद किया और घर आ गई। काफी प्रसन्न दिख रही थी तो मां और भाई दोनो ने मजाक में ही ऐसे ही पूछ लिया कि क्या बात है आज काफी खुश दिख रही हो ! मैने ऐसे ही कह कर टाल दिया। बताती भी तो क्या बताती।
Part -7
इस बार यादों की कड़ी कुछ लंबी हो गई थी। देर रात तक सब सोचती रही। सुबह उठी तो देखा दीपक और राहुल जी अभी सो ही रहे थे। मैने जगाया उन्हे। तैयार होकर राहुल जी अपने विद्यालय चले गए। दीपक भी तैयार होकर अपने काम से जा रहा था। मैने पूछा उससे
- क्या प्रोग्रेस है तुम्हारी एजेंसी वाले काम का।
- सब सही चल रहा है। दुकान फाइनल हो ही गई है। एक बड़ी कंपनी की एजेंसी लेने के प्रयास में हूं। मेरे एक दोस्त के पिताजी का कुछ परिचय है तो वो दिलवा देंगे। अगले सप्ताह ही पिता जी और मामा जी कुछ ने जो रुपया देने को कहा है , वो देंगे तो तैयारी शुरू हो जाएगी। मां, सबके आशीर्वाद से अगर ईश्वर ने चाहा तो दो महीने बाद ही सब शुरू हो जाएगा।
- अच्छा ठीक है। देखो मेरे पास भी कुछ रुपए हैं मेरे बैंक एकाउंट में , मैं भी कुछ सहायता कर दूंगी।
- ठीक है मां।
नाश्ता करके वो भी चला गया। में भी अपने सब काम निपटा कर थोड़ा आराम करने के लिए यूं ही लेट गई। अतीत में खो जाना जैसे एक आदत सी हो गई थी इसलिए मैं फिर खो गई यादों की अगली कड़ी में।
उस दिन की सुबह बहुत अच्छी थी। अच्छी सिर्फ इसलिए कि मन काफी प्रसन्न था। प्रसन्नता का कारण भी स्पष्ट था। रोज की तरह अच्छे से तैयार हुई और दुकान चली गई। मुझे ऐसा आभास होने लगा कि उस लड़के को लेकर जो कुछ भी मैं सोच रही थी , वो भी मुझे लेकर ऐसा ही कुछ सोच रहा हो शायद। आज अपने दिल से मैने एक शर्त लगा ली। दिल कह रहा था कि आज फिर वो किसी ना किसी काम से जरूर आयेगा पर मैं आश्वस्त नहीं थी। मैं यही चाहती थी कि मैं शर्त हार जाऊं और दिल जीत जाय। दो दिनों की बातों में किसी ने भी एक दूसरे का नाम तक नहीं पूछा था। आज मैने सोचा कि अगर वो आया और कुछ भी बात चीत शुरू हुई तो मैं नाम पूछ लूंगी उसका। मैं उसका पूछूंगी तो जाहिर है वो भी पूछेगा ही। एक लगाव सा होता जा रहा था मुझे उसके प्रति । दोपहर का समय था। दिल शर्त जीत गया और वो आ गया। इस बार उसने नौकर को सामान निकालने को नहीं कहा बल्कि सीधे मेरे पास ही आ गया।
मैने कहा - कुछ लेना नही है क्या ?
वो बोला - नही कुछ सामान नहीं चाहिए , एक समस्या है बस उसी के बारे में बताना है।
उसने बताया कि जिस मकान में वो किराए पर रहता है उस मकान में कुछ समस्या है इसलिए उसे कोई दूसरा अच्छा सा मकान चाहिए किराए पर।
उसने कहा - अगर तुम्हारी जानकारी में हो तो मुझे बता दो या पता चलने पर मुझे फोन कर दो।
मैने कहा - ठीक है।
उसने अपना फोन नम्बर बता दिया मुझे। मुझे भी नाम पूछने का मौका मिल गया।
मैने कहा - किस नाम से सेव कर लूं।
उसने अपना नाम राहुल गुप्ता बताया। उसने भी मेरा नाम और फोन नम्बर पूछ लिया। मैने अपना नाम बताया
- निधि
उसने मेरा पूरा नाम पूछा तो मैंने धीरे से कहा
- निधि गुप्ता
थोड़ी देर के लिए हम दोनो ही चुप हो गए। चुप हो जाने का कारण अलग अलग भी हो सकता है और एक भी हो सकता है। उसने अंग्रेजी में कहा -
What a coincidence !
तुम भी सरनेम गुप्ता लिखती हो
मैने हंसकर कहा - लिखती हो का क्या मतलब है। सिर्फ लिखती ही नही हूं , मैं हूं भी गुप्ता।
मेरे इस जवाब पर वो भी हंस पड़ा।
- अच्छा अब चलता हूं। मेरी बात याद रखना, कुछ पता चले तो बताना।
ऐसा बोलकर वो चला गया।
दुकान बंद करके जब मैं आने लगी तो मन इतना ज्यादा प्रसन्न था जितना पहले कभी नहीं हुआ। घर पहुंची तो सब लोग व्यस्त थे किसी न किसी काम में। मां ने मुझे देखा तो मेरे लिए चाय बनाने जाने लगी। शाम को मेरे लौटने पर मेरे लिए चाय मां ही बनाती थी। मैने मां का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा
- मां, आज चाय मैं बना देती हूं तुम बैठो
मां ने आश्चर्य से देखा मुझे। वो समझ नहीं पा रही थी मुझमें ये परिवर्तन क्यों है।
मां बोली - रहने दो तुम थकी होगी , मैं ही बना देती हूं।
पर मैने जिद किया तो मां मान गई। फिर मैने सबके लिए चाय बनाई। भाई , मां और मैं सबने साथ बैठकर चाय पी फिर मैं अपने कमरे में चली गई। ना जाने क्यों ऐसे ही एक गीत गुनगुनाने लगी। मेरा गुनगुनाना सुनकर मां तो मेरे कमरे में ही आ गई। मेरे इतना ज्यादा खुश होने का कारण पूछने लगी। मैं क्या कहती ,
मैं बोली - कुछ नही बस ऐसे ही। रास्ते में एक कार्यक्रम में ये गीत बज रहा था तो वही सुना है। गीत अच्छा था इसलिए जुबान पर आ गया।
मां भी आश्वस्त होकर चली गई।
सब आश्वस्त हो जांय पर खुद को कैसे समझाऊं। जाने कितने प्रश्न और उनके काल्पनिक खुद के बनाए और सोचे हुए उत्तर दिमाग में आते रहे। खुद ही अपने आप से प्रश्न करती और उत्तर भी खुद ही देती। राहुल क्या सोच रहा होगा ये भी मैं ही सोच रही थी और उसके काल्पनिक उत्तर भी। सोचने में यही तो फायदा है कि आप अपने आप को कभी भी किसी की भी भूमिका में ला सकते हैं। यही सब कुछ सोचते विचारते काफी देर हो गई। खाना वाना खा कर मैं सो गई।
अगले दिन दुकान गई। सब कुछ सामान्य ही था। आज राहुल नही आया। कोई कारण भी नही बन रहा था आने का। कुछ सामान वामान नही लेना रहा होगा तो किस काम से आता। दो चार दिन बीत गए ना वो आया और ना ही उसका कोई फोन। मैने अपने नौकर से पूछा कि उसके जानकारी में कोई ऐसा मकान हो जैसा राहुल को चाहिए तो वो बता दे या पता ही कर दे।
नौकर ने कहा - ठीक है दीदी , पता करके बताऊंगा।
नौकर को पता था कि मैं किसके लिए पूछ रही हूं पर उसे कोई आश्चय नही हुआ।
दूसरे दिन नौकर ने एक मकान के बारे में मुझे बताया। वो मकान मेरे घर के रास्ते पर ही था। किसी शर्मा जी का मकान था जिसमे ऊपर की मंजिल में वो खुद रहते थे और नीचे की मंजिल खाली थी। वो भी किसी अच्छे किरायेदार की तलाश में थे।
Part - 8
मैने रामू से बोला
- याद रखना जब राहुल आए दुकान पे तो मुझे याद दिला देना उसे मकान के बारे में बताना है।
- दीदी मैं बता दूंगा शाम को उन्हे। मुझे मालूम है वो कहां रहते हैं।
- तुम्हे कैसे मालूम ?
- मेरा एक दोस्त रहता है उनके घर के पास ही। एक बार मैं अपने दोस्त के घर गया था तो वो दिखे थे मुझे।
- अच्छा ठीक है बता देना उन्हे।
रामू ने उन्हें घर के बारे में बता दिया। मकान मालिक शर्मा जी से बात करके एक दो दिन में वो वहां शिफ्ट भी हो गए। शिफ्ट होने के बाद वो दुकान पर आए। देख कर ही लग गया कि वो संतुष्ट थे। आते ही मुझसे बोले
- धन्यवाद तुम्हारा , तुम्हारी वजह से इतना अच्छा मकान मिल गया।
- धन्यवाद मुझे नहीं , रामू को दीजिए। उसी ने बताया था मकान।
वो हंसकर बोला
- अच्छा अच्छा ठीक है उसको भी धन्यवाद बोल देंगे। रामू कह रहा था कि तुम्हारा घर भी उसी रास्ते पर है थोड़ा और आगे।
- हां है तो।
- ये तो और भी अच्छा हुआ।
- मतलब ?
उसके कहने का अर्थ तो मैं समझ ही गई थी। तभी रामू ने कहा
- दीदी आज मुझे थोड़ा जल्दी घर जाना है।
- बिना तुम्हारे कैसे होगा सब। अकेले मेरे बस का नहीं है। लेकिन कोई बात नही , ऐसा करते हैं आज दुकान जल्दी बंद कर देते हैं।
मैने देखा राहुल तब तक वहीं खड़े थे ।दुकान बंद करके मैं अपने घर की तरफ चली। राहुल बोले
- में भी घर की तरफ ही चल रहा हूं। तुम्हारे साथ ही चलते हैं। पैदल ही तो चलना है , बात करते हुए चलते हैं अगर कोई प्राब्लम ना हो तो।
- नही ऐसी कोई बात नही है , चलते हैं साथ में ही।
फिर मैं और राहुल दोनो साथ चल दिए। रास्ते में बहुत सी बाते हुईं। हम दोनो ने एक दूसरे के परिवार के बारे में भी काफी बातें। मेरे अब तक के जीवन में तो काफी रोमांच था। वो बहुत प्रभावित हुआ मुझसे। अपने बारे में भी उसने बहुत सी बातें बताई। बात करते करते उसका घर आ गया। थोड़ा औपचारिक अभिवादन करके वो अपने घर की तरफ मुड़ गया और मैं आगे चली गई। मेरा घर थोड़ा और आगे था। घर पहुंची तो चेहरे पर खुशी स्वाभाविक थी।
मुझे लग रहा था कि एक दूसरे के प्रति लगाव दोनो को ही था। अभी मैं इसे लगाव या आकर्षण का नाम ही दे रही थी। किसी दूसरे शब्द की गुंजाइश तो थी पर अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। ये तो पता ही था कि प्रेम का प्रारंभ यहीं से होता है। रोज की तरह खाना वाना खाकर सो गई।
शुबह उठी तो पता चला मेरे ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष की परीक्षा की तिथि आ गई है। मेरी तैयारी तो थी ही थोड़ी बहुत पर अब थोड़ा और अच्छी तरह से तैयारी करनी थी। अभी परीक्षा में समय था इसलिए मुझे अपने पर विश्वास था कि मैं पढ़ लूंगी ठीक से।
बहुत महत्वपूर्ण परीक्षा थी। इसके बाद में ग्रेजुएट हो जाऊंगी , ऐसा सोचकर अच्छा लग रहा था। में तैयार होकर दुकान आ गई साथ में कुछ किताबें भी ले आई थी कि समय मिलने पर कुछ पढ़ती रहूंगी परीक्षा के लिए। दुकान रोज की तरह चलने लगा। पूरा दिन सामान्य ही था। दुकान बंद करके घर आने लगी तो रास्ते में राहुल का घर पड़ा। मैने देखा कि वो अपने घर के सामने खड़े थे। उसने हाथ उठा कर मुझे रुकने को बोला। में रुक भी गई , चाहती तो ना भी रुकती। मुझे ऐसा लगने लगा कि लगाव और आकर्षण अपना दूसरा रूप लेने लगी है। उसने मुझसे थोड़ा मुस्कराकर कहा
- अगर कोई प्राब्लम ना हो तो थोड़ी देर मेरे घर पर मेरी बनाई चाय पी लो।
- नही आज नहीं , फिर कभी। मेरे परीक्षा की तिथि या गई है। घर पहुंचकर तैयारी शुरू करनी है।
- अच्छी बात है। परीक्षा तो सबसे जरूरी है। लेकिन मुझे प्रतीक्षा रहेगी उस दिन की
- किस दिन की ?
- जिस दिन तुम मेरे हाथों से बनी चाय पियोगी मेरे ही घर पे।
- हां ठीक है, उसमे कुछ हिस्सा तो मेरा भी होगा।
- वो कैसे ?
- चाय का सामान तो सब मेरी ही दुकान का होगा।
- हां वो तो है।
फिर हम दोनो ही हंस पड़े
उसकी बातों में , उसके चेहरे के भाव में एक अजीब सा अपनापन दिखा। एक बार तो मेरा मन किया कि रुक ही जाऊं पर अपने आप को समझा लिया मैने। लेकिन एक बात तो लगभग तय थी की प्रेम का प्रारंभ हो चुका था , वो भी दोनो तरफ से। मुझे ऐसा लगा कि मैं खुद भी प्रेम डोर में बंधना चाहती हूं। समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी आत्मीयता में ऐसा क्या विशेष है कि मैं खुद असहज महसूस कर रही हूं। इस तरह की अनुभूति पहले कभी नहीं हुई इसलिए कुछ अजीब सा लग रहा था। उसे मना कर के मैं घर वापस आ गई। कुछ पढ़ाई की और फिर खाना वाना खा के सो गई। सुबह उठी तो रात के सपने याद आए। सपनो में मैने देखा कि किसी पार्क में राहुल मेरे साथ साथ चल रहा है। आपस में कोई बात नही पर दोनो ही हाथों में हाथ लिए बस चले जा रहे थे। थोड़ी सी हंसी आ गई सपनो को याद कर के। तैयार हो कर दुकान आ गई। दिन अपने गति से चलने लगा। घर से दुकान और दुकान से घर। पांच छः दिन बाद राहुल दुकान पर आया वो समय दुकान बंद करने का था। दुकान बंद करके रामू अपने घर चला गया। हम दोनो ने एक दूसरे की तरफ देखा और बिना बोले ही एक दूसरे की भाषा समझ गए। कभी कभी मूक वार्तालाप बातचीत वाले वार्तालाप से कई गुना प्रभावशाली होते हैं। मूक भाषा में मनुष्य वो सब कह देता है जो बोल के नही कह पाता , बस सामने वाले व्यक्ति में उसे समझने की क्षमता होनी चाहिए जो शायद हम दोनो मे ही थी। मैं और राहुल एक ही रास्ते पर चल दिए। रास्ते में इधर उधर की बातें हुई। बात करते करते , राह चलते चलते कई बार हम दोनो की उंगलियां आपस में छू गई , कई बार एक दूसरे के हाथ टकराए। उंगलियां और हाथ आपस में मिलते मिलते कब हम दोनो के हाथ एक दूसरे की हाथों में आ गए पता ही ना चला। कुछ दूर चलने के बाद ये आभास हुआ तो ना जाने क्यों मैने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश भी नही की। मैने देखा की मेरी और राहुल दोनो की तरफ से एक सावधानी हो रही थी कि जैसे ही कोई आते जाते दिखता उधर से हम अपना हाथ छुड़ा लेते थे। वैसे भी उस रास्ते उस समय कुछ खास भीड़ नहीं रहती थी। और थोड़ी बहुत रहती भी थी तो इस व्यस्त जीवन शैली में किसके पास इतना समय है कि कोई दूसरे को इतना ध्यान से देखे। सब अपने आप में व्यस्त। उसका घर आ गया एक प्यार भरा अभिवादन कर वो अपने घर की ओर मुड़ गया। मैं भी अपने घर की तरफ चल पड़ी। आज मैने महसूस किया कि वो आत्मीयता और लगाव पूरी तरह से अपना रूप बदल कर " प्रेम " का रूप ले चुकी थी। संदेह की न तो कोई गुंजाइश थी और ना ही कोई जरूरत। में खुद भी प्रेम के इस अभूतपूर्व रंग में डूब जाना चाहती थी। मुझे नहीं पता था कि प्यार के इस सफर की कोई मंजिल भी है या नही लेकिन रास्ते अगर बहुत खूबसूरत हों तो मंजिल कुछ भी हो रास्ते पर चलने का भी अपना एक सुख है , एक आनंद है। वर्षों तक एक समझौते से भरी हुई शांत और नीरस सी जिंदगी की लहरों में एक उछाल आ चुका था।
Part - 9
मेरी परीक्षा शुरू हो चुकी थी इसलिए मैं दुकान थोड़ी जल्दी ही बंद कर देती थी रोज। मेरे पेपर संतोषजनक ही हो रहे थे। पूरे दिन काम करना , दिमाग और मन में इतनी सब उलझनें , परीक्षा पर फर्क तो पड़ना ही था। वैसे भी मेरे मन में धीरे धीरे ये बात घर कर चुकी थी कि मेरी पढ़ाई शायद एक औपचारिकता ही है। शायद डिग्री लेना ही एक मात्र लक्ष्य है। मेरी पढ़ाई के स्तर में गिरावट तो उस वर्ष से ही आ गई थी जिस वर्ष से मैने प्राइवेट फॉर्म भर के पढ़ाई शुरू की थी। करते करते परीक्षा खत्म हो गई। पेपर सब औसत ही हुए थे। इस बीच राहुल से मुलाकात बस एक दो दिन ही हो पाई थी वो भी बस कुछ समय के लिए ही। उसे पता था कि मेरी परीक्षा चल रही है शायद इसीलिए वो ना आया हो मुझसे मिलने। उसे मालूम था कि मेरी परीक्षा किस दिन खत्म होगी। मुझे ऐसा लग रहा था कि आज कल में वो आयेगा। वैसे मैं भी उससे मिलना चाह रही थी।
परीक्षा खत्म होने के दूसरे ही दिन शाम को दुकान बंद करने के समय वो आ गया। उसके आ जाने के बाद क्या होना है सब पता ही था। दुकान बंद करके रामू अपने घर की तरफ चला जाता और हम दोनो धीमी धीमी कदमों से आपस में बात करते हुए अपने घर की तरफ। ऐसा कई बार हो चुका था। अब तो शायद रामू को भी कुछ ना कुछ तो आभास हो ही गया होगा कि हम दोनो के बीच कुछ तो चल रहा है लेकिन उसने हम दोनो को इसका एहसास नहीं होने दिया। राहुल आ चुका था। रामू ने दुकान बंद किया और चला गया। हम दोनो भी पहले की तरह अपने रास्ते पर बात करते हुए चल दिए।
- पेपर कैसे हुए ?
- बस ठीक ठाक
- अब ग्रेजुएट हो जाओगी , इसके बाद क्या करने की सोचा है ?
- अभी कुछ सोचा नहीं है। रिजल्ट आने पर ही सोचूंगी। वैसे भी मेरा सोचा अक्सर होता नही है तो फिर पहले से ही क्या सोचना। जीवन में अब तक जो हुआ है वो सब बिना सोचे , बिना योजना के ही हुआ है। आगे देखा जाएगा क्या होता है।
- तुम्हारी बातों से निराशा साफ जाहिर है। ये बात सही नही है। इतनी कम उम्र में ही जीवन भर की कल्पना कर लेना अच्छी बात नहीं है। मुझे विश्वास है कि जो होगा अच्छा ही होगा। हर किसी के जीवन में अच्छे बुरे समय आते ही रहते हैं पर वो स्थाई नहीं होते।
इतना सब बोल के राहुल ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया। मैने इधर उधर देखा रास्ते में कोई और नहीं था। हम दोनो सड़क के एक किनारे चल रहे थे। बीच बीच में गाड़ियों का आना जाना लगा रहता था। गाड़ियों की लाइट की रोशनी जब हम दोनो पर पड़ती तो थोड़ा असहज हो जाते थे हम जो कि स्वाभाविक ही था। जैसे ही उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लिया मेरा मन प्रफुल्लित हो उठा। ऐसा लगा कि जैसे बहुत बड़ा विश्वास मुझे मिल गया हो। इस बार उसके हाथों में भारीपन था और मेरा हाथ भी उसने थोड़ा कस के ही पकड़ा था। मुझे ऐसा लगा कि मुझे बहुत कुछ मिल गया है। हम दोनो ने एक दूसरे की तरफ देखा। ऐसा लगा कि जीवन भर साथ निभाने की कसमें खा रहे हों मन ही मन। हम दोनो ही आपस में कुछ नही बोले। इतने दिनो में हम दोनो को ही एक दूसरे की मूक भाषा समझना आ गया था।
चलते चलते राहुल का घर आ गया। उसे वो चाय वाली बात याद थी।
- अब तो परीक्षा खत्म हो गई है , आज हो जाय एक एक चाय।
- ठीक है लेकिन अगर तुम्हारे मकान मालिक शर्मा जी देखेंगे तो क्या सोचेंगे।
- पहली बात तो ये कि शर्मा जी सपरिवार कहीं गए हैं और दूसरी बात कि शर्मा जी फर्स्ट फ्लोर पर रहते है। शाम के समय वो बालकनी में नही आते हैं इसलिए अगर वो होते तो भी कोई बात नही थी।
इस बार ये आमंत्रण मैं मना नहीं कर पाई। इसमें आमंत्रण और निवेदन दोनो ही था। मैं इसके घर में गई। दो कमरे का घर , आगे वाले कमरे में दो चार कुर्सियां और एक मेज , दीवाल से सटी हुई लकड़ी की एक चौकी। अलमारी और मेज पर कुछ किताबें और कापियां बिखरी हुई थी। एक दीवाल पर एक कैलेंडर टंगा था दूसरी दीवाल पर एक दीवाल घड़ी थी। एक अलमारी थी दीवाल में ही जिस पर कुछ किताबें रखी थीं और अलमारी के ऊपर वाले रैक पर भगवान की तस्वीरों के साथ पूजा से संबंधित कुछ सामान थे। उसने मुझे बैठने का इशारा किया और मैं बैठ गई।
- तुम बैठो मैं किचन में जाकर चाय बना लाता हूं , पीकर बताओ कि कैसी बनी है।
- ठीक है, थोड़ा जल्दी करना क्योंकि देर होगी तो मां परेशान होगी।
वो चाय बनाने चला गया। मैने घर का मुयायना कर लिया। आगे के कमरे के अलावा एक और कमरा था जाहिर है वो सोने का कमरा होगा। एक छोटा सा किचन और बाकी सब। वो चाय बना कर ले आया साथ में नमकीन भी। हम दोनो बैठकर चाय पीने लगे। कुछ बातें होती रही। चाय खत्म हो गई तो मैं चलने के लिए उठी।
- अब मैं चलती हूं , चाय के लिए धन्यवाद। चाय आपने अच्छी बनाई है।
- तारीफ के लिए थैंक यू
जैसे ही मैं चलने लगी , उसने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया और एक प्रेम भरी नजर से मुझे देखा। वो कुछ बोला नहीं पर उसकी आंखों में हजारों शब्द दिख रहे थे मुझे। एक साथ इतने शब्दों को समझना मेरे लिए कठिन हो रहा था। मैं असहज हो रही थी। मैने हाथ छुड़ाने की कोशिश की तो उसने एक हाथ छोड़ दिया और उस हाथ में मेरे चेहरे को ले लिया। अब उसके एक एक हाथ में मेरा हाथ था और उसके दूसरे हाथ में मेरा चेहरा। मैं बिलकुल नहीं समझ पा रही थी कि मैं क्या करूं। इतने में वो बोला।
- घबराओ नहीं। मैं जीवन भर तुम्हारा साथ निभाना चाहता हूं। अब तक तुमने मेरे ना बोले हुए शब्द बहुत समझे हैं। लेकिन आज मैं तुमसे स्पष्ट कहता हूं कि मैं तुम्हे बेहद प्यार करता हूं।
तुमसे शादी करके जीवन भर तुम्हारे साथ रहना चाहता हूं।
ऐसा कहकर उसने मेरा हाथ छोड़ दिया और चेहरे से भी हाथ हटा लिया। मैं बहुत ही कशमकश में थी। मैं क्या बोलूं मुझे शब्द नहीं सूझ रहे थे। मैं प्रेम में डूब चुकी थी। कुछ बोलने में असमर्थ थी पर ना जाने क्यों मुझे कुछ भी खराब नही लग रहा था। मैं कुछ देर और ना बोलती तो हो सकता है कि वो निराश हो जाता। मैं किसी भी हालत में उसे खोना नही चाहती थी। इस बार मैने खुद उसका हाथ अपने हाथ में लेकर बोला।
- मुझे तुम पर पूरा विश्वास है। मुझे भी तुमसे बहुत प्यार है। तुम जो चाहते हो वही मैं भी चाहती हूं लेकिन मैं इस समय कुछ भी कह पाने में असमर्थ हूं। अभी देर हो रही है , बाद में बात करेंगे।
- अच्छा ठीक है।
इतनी देर में हम दोनो सहज हो चुके थे। मैं अपने घर की तरफ चल पड़ी। घर पहुंची तो अजीब सी ऊहापोह की स्थिति थी। मेरा खुद का मन ही दो भागों में बंटा हुआ था।आधा मन खुशी और उत्साह से भरपूर था और आधा मन असमंजस में विचारमग्न था। बाल्यकाल से ही त्याग , समझौते और जिम्मेदारी के बोझ तले दबी हुई जिंदगी को एक प्यारा सा सौगात मिला था। मैं पूरी तरह प्रेम के इस सागर में डूब जाना चाहती थी। राहुल के घर पर केवल दो ही लोग थे एक मैं और एक राहुल। उस समय राहुल ने जिस प्यार और विश्वास का परिचय दिया था उससे मैं बहुत प्रभावित थी। पांव डगमगाने की परिस्थिति में भी अपने आप को संभाल लिया था हम दोनो ने। एक शिक्षित , जिम्मेदार और परिपक्व व्यक्ति से यही अपेक्षा भी की जाती है।मैने मन ही मन में ये प्रण ले लिया कि कुछ भी हो मुझे और राहुल को एक होना है और इस बार अगर किसी समझौते या त्याग की बात आई तो मैं मुकर जाऊंगी। मन में यही सब बवंडर चल रहा था। मां और भाई दोनो अपने आप में व्यस्त थे। खाना वाना खाकर सो गई। आंख बंद कर खूबसूरत सपनो में खो गई , दूर देश से आया एक राजकुमार मुझे घोड़े पर बैठाए आसमान में उड़ा जा रहा था और मैं बस उसका साथ दे रही थी , आसमान में सफेद बादलों में हम दोनो कभी कभी गुम हो जाते और फिर बाहर निकल आते। जब जब हम बादलों से बाहर निकलते घोड़े का रंग बदल जाता था। जब इंद्र धनुष के सातों रंग के घोड़े पूरे हो गए बारी बारी से फिर सपना खत्म हो गया और आंख खुल गई। देखा तो अभी रात बहुत बाकी थी। एक खुशी और संतोष की अनुभूति हुई सपनों को याद कर। थोड़ा मुस्कराई और वापस फिर सो गई।
Part - 10
एक लंबे समय से परिवार में खुशी के पल नही आए थे। आज जब दुकान बंद करके घर पहुंची तो मां और भाई बहुत खुश थे। पता चला कि भाई की एक सरकारी नौकरी के लिए चयन हो गया था । उसे अगले सप्ताह ही ज्वाइन करना था। खुशी की बात एक और भी थी कि उसकी पोस्टिंग अपने शहर से थोड़ी ही दूर दूसरे शहर में हुई थी। दूसरे शहर की दूरी बहुत अधिक नहीं थी , रोज आना जाना आसानी से संभव था। अपने शहर से ट्रेन और बस दोनो का ही साधन उपलब्ध था। सब बहुत प्रसन्न थे। मुहल्ले के लोग भी बधाई देने आ रहे थे। मां आज बहुत खुश दिख रही थी। हम सबको आज पिता जी की बहुत याद आ रही थी। घर में ही पूजा की अलमारी में पिता जी के चित्र को नमन किया हम सब ने फिर सब तैयार होकर मंदिर गए। आज शाम को खाने में कुछ विशेष बनना था। मां ने पूरे उत्साह और प्रसन्नता से खाना बनाया , मैने भी मां का पूरा साथ दिया। सब खाना वाना खा कर थोड़ी देर साथ बैठे, इधर उधर की बातें हुईं रोज की तरह। आज सभी के चेहरे पर खुशी और संतुष्टि के भाव थे , और हो भी क्यों ना , वर्षों की तपस्या का कुछ परिणाम सामने आया था। भाई की सफलता से मुझे भी कुछ प्रेरणा मिली थी। मैने भी सोचा कि रिजल्ट आने के बाद मैं भी किसी नौकरी वाले प्रतियोगिता की तैयारी करूंगी।
सब लोग सोने चले गए। मैं भी अपने कमरे में आ गई। सोने के लिए आंख बंद की तो राहुल की याद आ गई। इधर दो तीन दिनों से हम नहीं मिले थे। रात को सोते समय राहुल के बारे में सोचना , उसे याद करना और याद करते करते ही सो जाना रोज की दिनचर्या का एक अंग था। पता ही नहीं चला कब नींद आ गई। नींद खुली , घड़ी की तरफ देखा तो रात के तीन बजे थे। सब लोग अभी सो ही रहे थे। मैने भी थोड़ा पानी पिया और वापस फिर सो गई। दुबारा उठी तो देखा सब लोग उठ चुके थे। रोज की तरह तैयार हुई और दुकान आ गई।
दुकान रोज की तरह चलने लगी। कुछ खास नही रहा पूरे दिन। वही रोज की दिनचर्या। दुकान बंद करने का समय आ गया।रामू दुकान बंद करने लगा इसी बीच राहुल आ गए। रामू अब उनसे परिचित हो चुका था। राहुल रामू को देखकर मुस्कराए , उसके सर पर ऐसे ही हल्के से हाथ फेरे हमेशा की तरह। बदले में राहुल भी थोड़ा मुस्कराया और वो चला गया।
हम दोनो लोग भी अपने घर के रास्ते पर चल दिए। उधर उधर की बात करते रहे। कभी हम दोनो एक दूसरे के हाथों में हाथ लेकर चलते फिर छोड़ देते और फिर वापस हाथ पकड़ लेते एक दूसरे का। मैने राहुल को भाई की नौकरी के बारे में बताया तो वो बहुत खुश हुए और मुझे तथा पूरे परिवार को शुभकामनाएं भी दी। चलते चलते राहुल के घर का मोड़ आ गया। अब उसे मेरा हाथ छोड़कर अपने घर की तरफ जाना था। मैने हाथ छुड़ा लिया और उसने छोड़ भी दिया पर उसकी आंखों में आमंत्रण और आग्रह के भाव स्पष्ट थे। उसने मुझसे कुछ कहा नहीं पर उसके आंखों की भाषा मैं समझने लगी थी। उसने मुझसे कहा
- कोई आपत्ति ना हो तो चलो आज फिर थोड़ी देर बैठते हैं साथ। चाय पी के चली जाना।
मेरा मन नहीं किया कि उसकी आग्रह को ठुकराऊं। बिना कुछ बोले ही उसके साथ उसकी घर की तरफ मैं भी चल पड़ी। मन में भय या अविश्वास जैसी कोई चीज नहीं थी। मुझे राहुल पर पूरा विश्वास था इसीलिए मेरे कदम उसी तरफ चल पड़े। उसका घर आ गया। घर के पूरे माहौल से परिचित थी मैं।
- तुम बैठो मैं चाय बना लाता हूं
- ठीक है।
वो चाय बना लाया। दोनो आपने सामने कुर्सी पर बैठकर चाय पीने लगे। राहुल ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया। मैने भी कोई आपत्ति नहीं की क्योंकि ऐसा पहले भी हो चुका था और मुझे विश्वास भी था उस पर। चाय खत्म हो गई। मैं चलने के लिए उठी, उसने मेरा हाथ छोड़ दिया। चलने लगी तो उसने मेरे चेहरे को अपने दोनो हाथों में लेकर मेरी तरफ प्यार से देखा। मैं पूरी तरह उसके प्यार में खो गई। मैने भी उसकी तरफ उसी प्यार की भावना से देखा। हम दोनो मे कोई कुछ बोल नहीं रहा था। दोनो ही एक दूसरे की मूक भाषा समझ रहे थे। उसने अपने हाथों से मेरी दोनो आंखे बंद कर दी , मुझे अजीब सा लगने लगा , एक अजीब सी सिहरन सी होने लगी पूरे शरीर में। मैने उसका हाथ अपनी आंखों से हटाने की कोशिश की पर नही हटा पाई। वो मेरी पूरी मनोदशा से परिचित था। उसने मेरे माथे पर अपने होंठ रख दिए फिर हटा भी लिए। इतना करने के बाद मेरी आंखों से हाथ हटा लिया उसने। मेरी आंखें नम हो गईं , मेरी खुद की समझ में नहीं आ रहा था कि आंखें नम क्यों हुई , प्यार और भावना में या किसी डर से। मेरी नम आंखों को उसने देखा और बोला
- क्या हुआ ?
- कुछ नही , बस यूं ही।
फिर मैं बिना कुछ और बोले अपने घर की तरफ चल पड़ी।
पार्ट - 11
मैं घर पहुंच गई। खाना वाना खाकर अपने कमरे में आ गई। सोने की कोशिश करने लगी पर नींद कोसों दूर लग रही थी। मन अजीब से ऊहापोह में फंसा था। मेरा खुद का चरित्र ही दो भागों में बंट चुका था। एक चरित्र बहुत खुश था। जो भी चल रहा था जीवन में उससे खुश था। राहुल के प्यार में उसे कोई खोट नहीं दिख रहा था बल्कि उसे खुद एक कदम आगे बढ़ने में कोई हिचक नहीं थी। इस व्यस्त , मतलबी और अवसरवादी दुनिया में अगर राहुल जैसा कोई प्यार करने वाला मिला है तो उसे क्यों खोया जाय। अब तक जो भी हुआ उसमे अविश्वास करने जैसी कोई बात नही थी। दूसरी तरफ जो दूसरा चरित्र था वो संतुष्ट नहीं था। उसे ये सब अच्छा नहीं लग रहा था। बार बार वो परिवार के सदस्यों और समाज की दुहाई देता था। उसका अपना तर्क था कि परिवार के सदस्यों को ये सब नहीं पता है, अगर पता चल गया तो क्या होगा। मां और भाई क्या इसे स्वीकार करेंगे और करें या ना करें , बिना किसी को बताए राहुल से मिलना , उसके साथ चलना , उसके घर जाना क्या ये सब उन्हे अच्छा लगेगा ? पता चलने पर क्या वो नाराज नहीं होंगे। तरह तरह की बातें चल रही थीं दोनो चरित्रों में। दोनो के अपने अपने तर्क थे जो अपनी जगह सही भी थे। उन दोनो के बीच फंसी थी मैं। किसे सही मानू किसे गलत। वही हालत थी कि " उधर जाऊं या उधर जाऊं , बड़ी मुश्किल में हूं कि किधर जाऊं "। मेरा झुकाव पहले चरित्र की तरफ था। वर्षों से प्यार और लगाव को तरस रही थी मैं। आज मिला है तो क्यों खोऊं। परिवार के सदस्यों की चिंता क्यों करूं। उन्होंने कौन सा प्यार दिया है मुझे। सब के सब अपने मतलब में लगे थे। पिता जी मुझे बहुत प्यार करते थे , वैसे उन्होंने ने ही समझौता करने पर मजबूर किया था। समझोता करने की आदत तो उन्होंने ही डाली थी पर फिर भी मेरे लिए एक लगाव था उन्हे। अब वो तो थे नहीं तो उनकी तो बात ही खत्म थी। मां ने कभी मेरी कोई खास चिंता नहीं की , बस औपचारिकता ही करती रही। कम उम्र में ही एक दुकान की जिम्मेदारी और प्राइवेट फॉर्म भरकर पढ़ाई के लिए मां ने ही दबाव डाला था। भाई तो बस एक साल ही बड़ा था उससे क्या उम्मीद किया जाय। उसकी भी अलग ही दुनिया थी। वर्षों से बस एक ही ढर्रे पर चल रहा था सब। सब कुछ सोच विचार कर मैने निर्णय ले लिया कि चाहे कुछ भी हो जाय मुझे पहले चरित्र की तरफ ही जाना है। अगर परिवार के सदस्यों के साथ बहस की स्थिति आई तो वो भी करूंगी पर ये सब कुछ इस बात पर निर्भर था कि राहुल का मुझे कितना सपोर्ट मिलता है। बिना इसके तो कुछ भी संभव नहीं है। मुझे उस पर पूरा विश्वास था। यही सब सोचते सोचते काफी रात बीत चुकी थी। घड़ी की तरफ देखा तो रात के 2 बज रहे थे। सुबह उठकर दुकान भी जाना था इसलिए सोना जरूरी था वरना पूरा दिन एक थकान सा रहता। थोड़ा पानी पिया और फिर सोने की कोशिश करने लगी। नींद कब आई पता ही नही चला। सुबह आंख खुली तो 8 बज रहे थे। मैने देखा कि मां अपने काम में लगी थी। भाई नही दिख रहा था। मैने मां से पूछा तो मां ने बताया कि भाई गया आज अपनी नौकरी ज्वाइन करने। आज पहला दिन था तो वो थोड़ा जल्दी निकल गया। पूरे दिन की मेहनत और मन अशांत होने की वजह से मैं भूल गई थी कि आज उसे ज्वाइन करना है। शाम को भी जब दुकान से लौट के आई थी तो इस बात पर कोई चर्चा नहीं हुई थी। मेरी भी गलती थी , दुकान से लौटने के बाद मैं कल थोड़ी जल्दी ही सोने चली गई थी अपने कमरे में।
जाने क्यों मुझे अपने व्यक्तित्व में परिवर्तन सा दिखने लगा था। हर छोटी छोटी बात में मुझे नकारात्मकता दिखने लगी थी। अब आज ही भाई बिना मुझे बताए अपनी नौकरी ज्वाइन करने चला गया , इस बात को भी मैं नकारात्मक ही ले रही थी कि उसने मुझे क्यों नहीं बताया। ये भी हो सकता है कि उसे लगा हो कि मुझे जगाकर बताएगा तो मेरी नींद पूरी नहीं होगी पर इस तरफ मेरा दिमाग ही नहीं जा रहा था। मुझे लगने लगा था सब लोग मुझमें ज्यादा इंटरेस्ट नहीं ले रहे। मैने अपना दिमाग इन सब से हटा लिया वरना नकारात्मकता घर कर जाती मुझमें और इससे मेरे ही स्वास्थ पर प्रभाव पड़ता लेकिन दुकान जाने के लिए तैयार होते समय मैने यूं ही मां से बोल दिया कि आज पहला दिन था तो उसके जाते समय मैं भी जगी होती तो अच्छा रहता और नही भी जगी थी तो मुझे जगा लेना चाहिए था। मैने अपनी आपत्ति जता दी मां से। मां ने सुन लिया पर कुछ बोली नहीं। मैं भी तैयार होकर दुकान के लिए चल पड़ी।
दुकान रोज की तरह चलने लगा। दोपहर के समय राहुल आ गए दुकान पर। उन्हे कुछ सामान लेना था। सामान की लिस्ट रामू को देकर मेरे पास आए तो उन्होंने ही मुझे बताया कि मेरा रिजल्ट आ गया है। मेरा रोल नंबर उन्हे मालूम था। मैं पास हो गई थी पर अंकपत्र कुछ दिन बाद मिलना था इसलिए अंक प्रतिशत नही पता लग पाया। अभी तक अपना रिजल्ट मैं खुद देखती थी। आज राहुल ने मुझे मेरा रिजल्ट बताया तो मुझे बहुत अच्छा लगा।
- अरे तुम्हारा रिजल्ट आया है , अब तुम स्नातक हो गई हो तो कुछ मीठा हो जाय।
- हां बिल्कुल होगा, अंकपत्र आ जाने दीजिए।
- देख रामू , तुम्हारी दीदी ने मिठाई खिलाने को कहा है , अगर भूल जाएं तो याद दिला देना दीदी को , तुम्हारी जिम्मेदारी है।
- जी याद दिला दूंगा
- अरे मैं भूलूंगी ही नही, मुझे याद रहेगा। अब इतना भी ना विश्वास हो तो आज ही खा लीजिए।
- नही नही , में बस यूं ही बोल रहा था। अंकपत्र आने पर ही मिठाई खाऊंगा।
इतने में उनका सामान निकल गया और वो मुझे पेमेंट करके चले गए। इस दो तीन मिनट की हंसी ठिठोली में मेरे मन का तनाव कुछ कम हो गया। मुझे इस तरह आत्मीयता भरा व्यवहार अच्छा लगा। आज कुछ खास बात नही हो पाई राहुल से। वैसे भी दुकान पर और क्या बात होती। शाम हो गई , दुकान बंद करने का समय भी आ गया। दुकान बंद करके घर पहुंची , तब तक भाई अपने ऑफिस से आ चुका था। वो मिठाई भी लाया था। हम सब ने साथ में मिठाई खाई। भाई ने मुझसे कहा कि बस तुम्हारी ही प्रतीक्षा हो रही थी कि तुम आ जाओ तो सब साथ में मिठाई खाएंगे। ये बात सुनकर मुझे अच्छा लगा। मैने मां की तरफ देखा तो मुझे एहसास हुआ कि आज सुबह की आपत्ति मां ने भाई से बता दी थी। बहरहाल जो भी हो आज की शाम सब खुश थे। खाने में भी कुछ स्पेशल बना आज। भाई ने ऑफिस और अपने काम के बारे में कुछ बात की और फिर हम सब सोने के लिए अपने अपने कमरे में चले गए। मैं अपने कमरे में आई और सोने को कोशिश करने लगी। आज दिल पर कुछ भार नहीं था। पूरा दिन अच्छे से बीता था। थोड़ी देर बाद मुझे नींद आ गई और मैं सो गई। सुबह उठी तो सब उठ चुके थे। भाई अपने ऑफिस की तैयारी में लगा था। उसका ऑफिस दूसरे शहर में था इसलिए उसे जल्दी निकलना था। मां का काम थोड़ा बढ़ गया, अब उसे हम दोनो के लिए लंच बॉक्स तैयार करना करना पड़ेगा। मैं भी मां के साथ लग गई। पहले भी जब सिर्फ मेरे लिए बनाती थी तब भी मैं मां के साथ लगकर कुछ सहायता कर देती थी। भाई तैयार होकर ऑफिस चला गया और मैं भी दुकान चली आई। अब एक चिंता और होने लगी थी कि मैं और भाई दोनो ही दिन भर घर पर नहीं होंगे तो मां को अकेले ही रहना पड़ेगा।
Part - 12
सामान्य दिनों की तरह ही दुकान की प्रक्रिया चलती रही। आज दिन भर एक बात दिमाग में घूमती रही। पिताजी के ना होने पर मैने दुकान संभाली। अगर ना संभालती तो परिवार कैसे चलता यद्यपि मेरा मन नहीं था दुकान पर बैठने का। मुझे अपनी पढ़ाई से भी समझौता करना पड़ा।जब भाई ने साफ मना कर दिया तो फिर कोई और विकल्प भी नही था। आज परिस्थिति बदली है। भाई की नौकरी लग चुकी है तो क्यों ना परिवार की जिम्मेदारी अब भाई ले ले और मुझे दुकान पर बैठने से फुरसत मिले। इतने वर्ष मैं दुकान पर बैठी लेकिन मेरा मन कभी नहीं लगता था दुकान पर। हमेशा एक जिम्मेदारी या एक बोझ की तरह ही समझा मैने इसे। अब समय आ गया है कि मुझे इससे फुरसत मिले और मैं अपनी आगे की शिक्षा भी अच्छे से कर सकूं। भाई को भी अपनी जिम्मेदारी का एहसास होना चाहिए। मेरा मन था कि मैं ये बात मां से कहूं लेकिन कब और कैसे कहूं , इसी असमंजस में थी। शाम हो गई लेकिन दुकान बंद करने के समय में अभी लगभग एक घंटा शेष था। मैने रामू से बोला
- रामू , ऐसा है कि मेरी तबियत ठीक नहीं लग रही है इसलिए आज दुकान थोड़ी जल्दी बंद कर दिया जाय। मुझे घर जाना है।
- ठीक है दीदी , बंद कर देते हैं। आप कहो तो कोई दवा ले आऊं।
- नही, इसकी कोई जरूरत नहीं है, ऐसे ही ठीक हो जाएगा।
दुकान बंद हो गई और मैं घर के तरफ चल पड़ी। चलते चलते राहुल के घर का मोड़ आ गया। मैं थोड़ी देर के लिए रुक गई। मैने सोचा कि आज जो विचार मेरे मन में घूम रहा था उसके बारे में राहुल से भी चर्चा कर लूं। उससे थोड़ी राय ले लूं कि मां से ऐसा कहना उचित है क्या ? फिर मैं राहुल के घर की तरफ ही चल पड़ी। रास्ते भर दुविधा में थी कि मेरा ये कदम सही है या नही। अपने घर की बात पर किसी और से राय लेना क्या उचित है ? पर भाई और मां के सिवा और कौन है जिससे मैं कोई बात कह सकूं। एक राहुल ही तो है जिस पर मुझे विश्वास था। आज राहुल के घर जाने में एक बात और नई थी। इससे पहले मैं दो बार जा चुकी हूं पर उसमे राहुल का आग्रह था जिसे मैं नहीं टाल सकी थी। आज मैं खुद अपने निर्णय से जा रही थी। आग्रह पर जाना और अपने मन से जाने में बहुत बड़ा अंतर है। सोचते सोचते राहुल का घर आ गया। मुझे एक दो लोगों ने देखा पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।
मैने घर के दरवाजे पर हल्की सी थाप दी। बस कुछ ही सेकंड बाद राहुल ने दरवाजा खोला। मुझे यूं अचानक देख कर वो चौक गया
- अरे तुम ! यूं बिना बताए अचानक , सब कुशल तो है।
- क्यों , मैं बिना बताए अचानक नही आ सकती क्या?
- अरे नही , मेरा ये मतलब नहीं है लेकिन फिर भी तुम्हे यूं अचानक देखकर मेरा चौकना स्वाभाविक है। आने को तो कभी भी आ सकती हो , तुम्हारा अपना घर है।
- मेरा घर ! क्या मतलब ?
इस बात पर वो मौन हो गया। मुझे उत्तर की प्रतीक्षा थी। वो थोड़ा रुक कर बोले
- तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर है मेरे पास पर अभी उसे बोलने का समय नहीं आया है। तुम खुद ही समझ सको तो समझ लो। मुझे विश्वास है कि मेरे बिना बोले हुए शब्द का अर्थ तुम समझ लोगी।
मैने कोई उत्तर नही दिया।
- अब बैठो और ये बताओ कि आना कैसे हुआ ?
मैने अपनी पूरी बात बता दी जो भी आज दिन भर दिमाग में चल रहा था।
- अब तुम्ही बताओ कि मैं क्या करूं। मां से ऐसा बोलना उचित है या नही। मुझे लगा कि तुमसे राय लेनी चाहिए इसीलिए आज मैने दुकान कुछ समय पहले ही बंद कर दिया है।
मुझे विश्वास है कि तुम सही राय दोगे।
कुछ देर तक खामोशी छाई रही। फिर थोड़ी देर बाद राहुल ने कहा
- देखो , यह तुम्हारी व्यक्तिगत बात है। इसे तुम्हे खुद ही सोचना चाहिए लेकिन तुमने मुझ पर इतना विश्वास किया है तो मैं तुम्हे निराश नहीं करूंगा। मेरे ख्याल से तुम्हे ये बात जरूर करनी चाहिए। तुम ऐसा करो कि पहले मां को विश्वास में लो। किसी दिन जब मां का मूड सही हो तो अपनी बात कह सकती हो। वैसे तो ये तुम्हारा अधिकार भी है पर जहां भावनाएं प्रबल हों वहां अधिकार नहीं देखा जाता बल्कि भावनाओं का सम्मान करना ही उचित है। मां से कहो कि वो उचित समय देखकर किसी दिन भाई से बोले ये बात। तुम्हे इस बात का ख्याल रखना होगा कि किसी की भावनाओं को कोई ठेस ना पहुंचे। भावनाओं की डोर बहुत मजबूत नहीं होती उसे टूटने में समय नहीं लगता। ऐसा करके देखो इसका क्या परिणाम निकलता है। तुमने अपने परिवार के लिए इतना सब किया है , मुझे विश्वास है कि जो होगा अच्छा ही होगा। मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं।
राहुल इतना सब बोल गए। इतने अच्छे से और इतनी आत्मीयता से सब कहा उसने कि मैं बस सुनती रही। बहुत मिठास भरी और प्रभावशाली अंदाज है कुछ भी कहने का। इतना सब बोलते बोलते कब उसने मेरे दोनो हाथ अपने हाथ में ले लिए मुझे पता ही नही चला। बात खत्म होने पर भी मेरा हाथ उसने नही छोड़ा। फिर मैने हाथ छुड़ाने की हल्की सी कोशिश की लेकिन उसने हाथ नही छोड़ा मेरा बस एक टक देखता रहा कुछ देर। मैने देखा एक अजीब सी प्यार भरी गहराई थी उन आंखों में। मुझे लगा कि कोई बात जो वो कह नहीं पा रहा था, उसकी आंखें कह रही थीं। मुझे कुछ असहज देख कर उसने मेरे हाथ छोड़ दिए। हम दोनो मे बेहद प्यार था। हमारे प्यार में विश्वास की एक डोर भी थी जो ना वो तोड़ना चाहता था और ना मैं।
- अच्छा अब मैं चलती हूं। काफी समय हो गया है। समय पर घर नहीं पहुंचूगी तो सब जाने क्या सोचेंगे। जैसा होगा में बताऊंगी तुम्हे।
ऐसा बोलकर मैं चलनी लगी तो राहुल बाहर तक आए मेरे साथ। फिर मैं अपने घर की और चल पड़ी और वो भी अंदर चले गए।
घर पहुंची तो मैने किसी से नहीं बताया कि आज मैने दुकान कुछ पहले ही बंद कर दी। घर वापसी का समय रोज की तरह ही था इसलिए किसी ने कुछ पूछा भी नही। रोज की तरह चाय पिया , थोड़ी देर सबके साथ बैठ के कुछ इधर उधर की बातें हुईं और फिर खाना खाकर अपने कमरे में सोने चली गई।
Part - 13
आज सुबह मैं कुछ जल्दी ही उठ गई। देखा कि भाई अभी सो ही रहा था और मां जग चुकी थी। मां किसी काम में व्यस्त थी। मैं भी उसके पास जाकर उसके काम में हाथ बंटाने लगी। मां को थोड़ा आश्चर्य हुआ मेरे इतनी जल्दी उठ जाने पर। मां मुझसे बोली
- क्या हुआ, आज इतनी जल्दी उठ गई सोकर ?
मैं कुछ बोली नहीं तो मां ने ध्यान से देखा मेरी तरफ और फिर बोली
- क्या हुआ ?
फिर मैने मां से बोला
- मां, इधर कई दिनों से एक बात मेरे मन में है पर संकोच वश मैं कह नहीं पा रही।
- अरे बोलो भी, अब मुझसे नही कह पाओगी तो किससे कह पाओगी। मुझसे क्या संकोच।
बोलो क्या बात है।
फिर मैने मां से अपनी सभी बातें जो इधर कुछ दिनों से मेरे मन में चल रही थी, कह दी।
- बस मां यही बात है। मेरा जरा भी मन नहीं रहता दुकान जाने का। बस किसी तरह इतने सालों तक जाती रही। लेकिन अब भाई की नौकरी लग चुकी है तो वो घर के खर्चे आराम से उठा सकता है। तुम भाई से बात करके देखो। मेरी बात शायद वो ना माने पर तुम्हारी बात मान जाएगा। अगर ऐसा हो जाय तो मैं कुछ और पढ़ना चाहती हूं। सोच रही हूं कि मैं अपनी पढ़ाई जारी रखूं और कालेज में एडमिशन ले लूं।
मां ये सब सुनकर थोड़ी देर के लिए चुप हो गई। फिर थोड़ी देर बाद बोली।
- अचानक ये बात तुम्हारे मन में कैसे आ गई।
- अचानक नही मां, मैं तो दुकान से हमेशा ही छुटकारा चाहती थी पर परिस्थितियां ऐसी नही थीं कि मैं कुछ बोल पाऊं। आज सब कुछ अच्छा हो गया है तो मैं कह पा रही हूं।
मां फिर चुप हो गई तो मुझे ये आभास हुआ कि मां शायद मेरे पक्ष में नहीं है। फिर थोड़ी देर बाद मां बोली
- अच्छा ठीक है, में बात करूंगी उससे फिर देखेंगे।
इतना बोलकर मां वापस अपने काम में लग गई। मैं भी वहां से जाने के लिए उठी तो मां ने बड़े ही आश्चर्य से देखा मुझे। मैं दुकान जाने के लिए तैयार होने लगी। भाई भी उठ चुका था और ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था। थोड़ी देर बाद भाई ऑफिस चला गया और मैं भी दुकान आ गई।
दुकान अपने रोज की गति से चलने लगी। आज मेरा बिल्कुल ही नही मन लग रहा था। मैने मां से सारी बात कह दी थी लेकिन कोई संतोषजनक उत्तर नही मिला था, उत्तर क्या, कोई आश्वासन तक नहीं मिला था। मन अजीब सा लग रहा था। बार बार इसी बात को सोचकर मन परेशान था कि मां जब भाई से ये बात बोलेगी तो भाई का क्या जवाब होगा। भाई की प्रतिक्रिया को लेकर एक जिज्ञासा भी थी और एक डर भी था। जब भी मन परेशान होता, मुझे किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत महसूस होती थी जो मुझे कुछ दिलासा दे सके और ऐसा कोई राहुल के सिवा और कौन हो सकता था। आज मुझे उसकी प्रतीक्षा थी। दुकान बंद करने का समय आ गया। रामू ने दुकान बंद कर ही रहा था कि जिसकी प्रतीक्षा थी वो भी आ गया। मैं खुश हो गई उन्हे देखकर। रामू दुकान बंद करके चला गया और हम दोनो भी अपने राह चल दिए बात करते करते। हम दोनो कई बार यूं ही चले हैं इस समय इस रास्ते पर कुछ बात करते करते।
- आज मैने मां से बोल तो दिया है। मां ने कहा है कि वो बात करेगी भाई से पर मुझे कुछ डर सा है। मैं सोच रही हूं अगर भाई ना माना तो फिर क्या होगा। मुझे बिल्कुल ही नही अच्छा लगता है दुकान पर बैठना।
- अभी इतनी जल्दी हार मत मानो। पहले देखो क्या होता है फिर सोचा जाएगा।
ऐसे ही बातें करते करते हम दोनो चल रहे थे। हम दोनो की चाल बहुत तेज नही थी। बात करते करते, यूं ही चलते चलते हाथों में हाथ आ जाना अब स्वाभाविक सा हो गया था। पहले कुछ अजीब सा लगता था पर अब नहीं।
ऐसे ही चलते चलते राहुल के घर का मोड़ आ गया। एक प्यार भरा अभिवादन और एक हल्की सी मुस्कराहट के साथ वो अपने घर की तरफ मुड़ गया। मैं भी अपने घर की तरफ चल पड़ी।
Part - 14
मैं घर पहुंच गई। भाई अपने ऑफिस से आ चुका था। मां और भाई दोनो ही साथ बैठ कर टीवी देख रहे थे। मुझे आया देख मां उठी मेरे लिए चाय बनाने के लिए रोज की तरह। भाई एक नजर मुझे देखकर फिर टीवी देखने में लग गया। मैं अपने कमरे में चली गई। अजीब सी शांति दिख रही थी घर में। मुझे ऐसा आभास हुआ कि मां ने शायद भाई से बात कर ली है। मैं भी आज किसी भी समझौते के मूड में नहीं थी।मैने सोचा कि आज मैं बोलूंगी जो भी मेरे मन में है। थोड़ी देर बाद मैं भी आ गई सब के पास। हम तीनो लोग साथ में ही चाय पीने लगे। थोड़ी देर भाई बोला
- कैसा चल रहा है सब दुकान का काम।
- सही ही चल रहा है।
- कोई दिक्कत है क्या दुकान पर ?
- नही तो !
- मां कह रही थी कि तुम्हारा मन नहीं लगता और इसलिए तुम अब दुकान पर नही जाना चाहती। एकाएक ऐसा क्या हो गया।
- कुछ भी एकाएक नही है। दुकान पर बैठने का मन तो मेरा कभी भी नही रहा।
- तो अब तक कैसे जा रही थी।
- और हो भी क्या सकता था। पिताजी के ना होने पर तुमने साफ मना कर दिया था कि मैं तो दुकान पर नही बैठूंगा। अब मां तो नही जा सकती थी दुकान पर , फिर मेरे अतिरिक्त दूसरा क्या विकल्प था। उस समय आवश्यकता थी इसलिए मैने समझौता कर लिया पर अब तुम्हारी नौकरी लग गई है। समय पहले से अच्छा हो गया है तो अब परिवार की जिम्मेदारी तुम उठा सकते हो। मैं अब तक प्राइवेट ही पढ़ रही थी। मुझे समय मिल जाएगा तो मैं भी अपना पोस्ट ग्रेजुएट अच्छे से कर सकूंगी कालेज में एडमिशन लेकर। मुझे पढ़ना है अभी।
थोड़ी देर तक शांति बनी रही। सभी चकित थे कि आज मैं इतना कैसे बोल रही हूं। ना बोलने या कम बोलने से ही इतने समझौते करने पड़े बचपन से ही पर अब मैं ऊब चुकी थी इन सब से। थोड़ी देर बाद मां बोली
- फिर दुकान का क्या होगा ?
मैने कहा - दुकान का सोच लिया जाएगा। दुकान की आवश्यकता घर खर्च के लिए ही तो थी। अब अगर भाई सक्षम है इसके लिए तो नैतिक रूप से भी मेरा दुकान पर बैठना सही नही है। उस समय कोई विकल्प नहीं था तो और बात थी।
भाई बोला - ऐसी भी क्या जरूरत है आगे पढ़ाई की। ग्रेजुएट हो गई हो, इतना पर्याप्त है।
मैने कहा - क्यों ? तुम्हारी पढ़ाई जरूरी है और मेरी नही। तुम पढ़ लिख कर सरकारी नौकरी कर सकते हो, मैं नही ?
भाई - तो तुम्हे भी नौकरी करनी है।
- मुझे नौकरी करनी है या नही ये बाद की बात है पर मुझे अब कालेज जा कर पढ़ना है और अब मैं दुकान पर नही जाना चाहती।
मुझे ऐसा लगा कि कोई भी मेरी बात से सहमत नही है। मैं आज पहली बार इतना बोली हूं। ना पिता जी से , ना मां से और ना ही भाई से, किसी से भी मेरी इतनी बात नही हुई आज तक पर आज बात क्या आज तो मैने बहस कर लिया सबसे। मेरी आंखों में आंसू आ चुके थे। बहने को बेताब आंसुओं को मैं रोक नही पाई। बहते आंसुओं को लिए लिए मैं अपने कमरे में वापस आ गई। बहुत कष्ट हो रहा था आज मुझे। मां भी मेरा साथ नही दे रही थी। मैं खुद को बिल्कुल अकेली महसूस कर रही थी। कौन है मेरा जो मेरे लिए सोचता है , मेरे भले के लिए या मेरे भविष्य के लिए सोचता हो। मैं बहुत देर तक जागती रही और रोती रही। मां ने खाने के लिए बुलाया पर में नही गई तो थोड़ी देर बाद मां मेरे कमरे में खाना रखकर चली गई। खुद अपने ही घर में अकेलापन लग रहा था। सामने दीवाल पर पिताजी की तस्वीर टंगी थी। आज पिताजी की बहुत याद आ रही थी। वो मुझे बहुत प्यार करते थे। मुझे अंग्रेजी मीडियम स्कूल में ना पढ़ा पाना उनकी विवशता थी।
मैं बिना खाना खाए ही सो गई। भाई या मां कोई भी मेरे कमरे में मुझसे कुछ पूछने या देखने तक नहीं आया। यूं ही आंखों में आंसू लिए सोचते सोचते कब नींद लग गई पता ही नही चला। सुबह नींद खुली तो देखा मां और भाई दोनो जग चुके थे। मुझसे किसी ने कुछ कहा नहीं पर फिर भी मैं आकर सबके साथ बैठ गई। मैने सोचा कि कल शाम का जो भारीपन था वो साथ बैठकर कुछ कम होगा। कुछ और बात होगी और कोई रास्ता निकलेगा पर बातें जहां थीं वहीं के वहीं रह गईं। कोई कुछ बोल नहीं रहा था उस विषय पर। थोड़ी देर भाई उठा और ऑफिस के तैयार होने लगा। मां भी उठी और मेरे और भाई के लिए लंच बॉक्स तैयार करने चली गई। मैं भी क्या करती, उठकर दुकान जाने के लिए तैयार होने लगी। मैं तैयार होकर आई अपने कमरे से तब तक भाई ऑफिस जा चुका था। मैने मां से पूछा
- क्या हुआ? कुछ सोचा भाई ने।
- अभी नही। उसने कहा है सोच कर बताऊंगा।
- तुम ही कुछ समझाओ भाई को।
- दोनो लोग बड़े हो गए हो , खुद समझो और जो जी में आए करो। मुझमें इतनी क्षमता नहीं है कि मैं किसी को समझा पाऊं।
स्थिति की गंभीरता देख मैं कुछ नही बोली और अपना लंच बॉक्स लेकर दुकान के लिए निकल पड़ी।
Part - 15
दुकान आ तो गई पर आज कुछ भी करने का मन नहीं कर रहा था। मन बहुत ही निराशा से भरा हुआ था। इतनी ज्यादा उपेक्षा और वो भी अपने ही परिवार में , सहन नही हो रही थी। क्या करूं क्या ना करूं कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। आगे की शिक्षा का क्या होगा , कैसे होगा , ये सब भी दिमाग में घूम रहा था। किसी तरह पूरा दिन बीता और दुकान बंद करने का समय आ गया। उसी समय राहुल भी आ गया। अब दुकान बंद करने के समय उसका आ जाना और फिर साथ में घर की ओर चलना , ये एक सामान्य सी बात हो गई थी। दुकान बंद करके रामू अपने घर चला गया और हम दोनो भी अपने घर की तरफ चल दिए। रास्ते भर हम दोनो कुछ ना कुछ बात करते रहे, कभी इधर उधर की बातें और कभी अपने अपने परिवार की बातें। अब मैं भी राहुल के परिवार के सभी लोगों को जान गई थी। उन सब से कभी मुलाकात तो नही हुई पर जिस तरह से राहुल ने सबके बारे में बताया उस तरह से एक काल्पनिक तस्वीर मन में बन चुकी थी।थोड़ी देर में हम दोनो उस मोड़ पर पहुंच गए जहां से दोनो के घर का रास्ता अलग अलग दिशा में मुड़ता था। वो अपने घर की तरफ चला गया और मैं अपने घर की तरफ चल पड़ी। घर पहुंची तो देखा भाई अपने ऑफिस से आ चुका था। अक्सर ऐसा होता था कि वापस आने पर मां और भाई दोनो साथ बैठे दिखते थे पर आज भाई अकेले ही बैठा था। मां साथ नही बैठी थी शायद अपने कमरे में हो। थोड़ा अजीब लग रहा था इसलिए मैं अपने कमरे में जाने के बजाय सीधे मां के कमरे में ही चली गई। मां बिस्तर पर लेटी थी। पूछने पर पता लगा कि उसके सर में दर्द है। मैं बिना अपने कपड़े चेंज किए ही किचन में गई और तीन कप चाय बना दी। मुझे पता था कि अगर मां ने चाय नही बनाई होगी तो किसी ने भी शाम की चाय नही पी होगी। एक कप चाय भाई को देकर मां के कमरे में गई। मां को उठाकर चाय दे दी और एक सर दर्द का टेबलेट भी दे दिया जो मैं अपने पर्स में रखे हुई थी। दवा देकर अपने कमरे में गई और चेंज होकर थोड़ा आराम कर लिया। फिर मां के पास आकर मैंने कहा कि आज तुम आराम करो खाना मैं बना देती हूं। मां कुछ नही बोली। दुबारा पूछने पर बोली ठीक है। मैं समझ गई कि कुछ तो बात है वर्ना भाई और मां सब इतने शांत नहीं रहते।
सब लोग खाना वाना खा के सोने चले गए। खाना खाते समय सब लोग लगभग शांत ही रहे। में अपने कमरे में चली आई। अभी कुछ समय ही हुआ था आए हुए कमरे में कि मां भी आ गई मेरे पास। आकर मेरे पास बैठ गई चुपचाप। मैने पूछा कि क्या बात है तो बड़े उदास मन से बोली
- समर कह रहा है कि उसे रोज आफिस जाने और रोज घर आने में दिक्कत होती है। रोज रोज आने जाने से थकान होती है। अक्सर साधन भी नही मिलता आने जाने के लिए और अभी इतना पैसा भी नही है कि कोई खुद का साधन खरीद पाए। तो वो कह रहा है कि अब वो वहीं रहेगा जिस शहर में उसका ऑफिस है। हर शनिवार को आएगा और सोमवार की सुबह चला जाएगा। आज शनिवार है , सोमवार को चला जाएगा फिर अगले शनिवार को ही आएगा।
- ओह मां। ये तो बहुत गंभीर बात है। अगर भाई सप्ताह अंत पर ही आएगा बाकी दिनों वो वहीं रहेगा। तो उसके खर्चे भी बढ़ जाएंगे और फिर वो घर खर्च में सहयोग नही कर पायेगा। फिर तो मेरा दुकान ना जाने वाली बात तो वहीं रह गई। अब घर खर्च के लिए मुझे दुकान तो जाना ही होगा।
- मैं भी क्या करूं। मैं कुछ बोलती नही हूं लेकिन तुम्हारा दुकान जाना मुझे भी कुछ अच्छा नही लगता। परिस्थितियों की वजह से कुछ नही बोल रही। ये बात तो बिलकुल सही है कि इस परिस्थिति में तुम्हे दुकान तो जाना ही होगा। तुम आगे की पढ़ाई भी प्राइवेट ही कर लो। साथ में कुछ और तैयारी भी करो। कुछ अच्छा हो जाएगा तो फिर दुकान ना जाने के बारे में सोचा जाएगा। अब सब कुछ तुम पर ही निर्भर है।
मां की ऐसी बातें सुनकर मैं बहुत दुखी हो गई। मां भी बहुत परेशान हो गई थी। उम्र के इस पड़ाव पर आकर वो बच्चों पर आश्रित हो गई थी। बच्चों क्या हम दोनो ही तो थे। भाई अपनी अलग व्यवस्था बनाने के रास्ते पर चल पड़ा था। उसने मां के बारे में जरा भी नही सोचा। वो ये मानकर चल रहा था कि उसके जाने के बाद मैं मां का ख्याल रख लूंगी।
बात ये नही है कि मैं मां का ख्याल रख लूंगी या नही। बात ये थी कि भाई अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रहा था। वैसे तो मां हमेशा भाई की तरफदारी ही करती है पर इस बार बहुत दुखी थी भाई के इस निर्णय से। थोड़ी देर बात करके मां वापस अपने कमरे में चली गई। मुझे मां की बहुत चिंता हो रही थी। उम्र भी हो गई थी मां की और अक्सर बीमार भी रहने लगी थी। जैसे तैसे सुबह हुई। आज रविवार था तो भाई को ऑफिस नही जाना था इसलिए वो बाहर कमरे में बैठा चाय पी रह था। मां जल्दी उठ जाती है हमेशा तो उसने उठ के चाय बना दी होगी। मैं भी किचन में गई और अपना चाय गर्म करके एक कप में लेकर भाई के पास बैठ गई। थोड़ी देर हम दोनो में चुप्पी बनी रही। फिर भाई बोला
- मां ने तो तुम्हे सब बता ही दिया होगा। मुझे मालूम है कि मेरे इस निर्णय से तुम संतुष्ट नहीं होगी पर मेरी भी कुछ समस्याएं हैं जिसकी वजह से मुझे ऐसा करना पड़ रहा है।
भाई की ये बातें सुनकर मेरा मूड खराब हो गया। मुझमें भी बोलने की हिम्मत आ गई। मुझे मालूम था कि मेरे बोलने से कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला। अगर फर्क पड़ने वाला होता तो मां के साथ मुझे भी पहले बताता या राय लेता। पर उसने ऐसा नहीं किया। मैने भी थोड़ा तेज आवाज में स्पष्ट शब्दों में कहा
- परिवार की जिम्मेदारी , मां के प्रति कर्तव्य और जिम्मेदारी, बहन के प्रति कर्तव्य और जिम्मेदारी से बड़ी हैं तुम्हारी समस्याएं, जो तुमने इतना बड़ा निर्णय ले लिया और वो भी बिना किसी की सलाह के।
फिर भाई बोला
- देखो मैं बहस करने के मूड में बिल्कुल नही हूं। तुम जो भी समझो। कल सोमवार है , में चला जाऊंगा। मैने मकान देख रखा है , कल ही शिफ्ट भी हो जाऊंगा। फिर सप्ताह अंत में आऊंगा। मैं कोशिश करूंगा अपनी जिम्मेदारियां उठाने की पर तुम्हे दुकान जाना ही होगा। इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं है।
मैं बिना कुछ बोले वहां से उठ गई। मां ने रोज की तरह लंच बॉक्स तैयार कर दिया था। लंच बॉक्स लेकर में दुकान चली आई।
Part- 16
रविवार का दिन, दुकान पर रोज की अपेक्षा ज्यादा लोगों का आना लेकिन कुछ मन नहीं लग रहा था। मन कर रहा था कि दुकान बंद करके घर चली जाऊं। मन में पूरा कोलाहल मचा था जो शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। आज मुझे अपनी तो कम लेकिन मां की चिंता बहुत हो रही थी। अपनी पढ़ाई तो मैं फिर प्राइवेट फॉर्म भर के ही कर सकती थी। भाई की सोच पर बहुत गुस्सा आ रहा था। वो ऐसा कैसे कर सकता है। इतना कैसे बदल गया वो कुछ ही दिनों में। पूरा दिन किसी तरह बीता। दुकान बंद करने का समय हो गया तो रामू ने दुकान बंद कर दी। मैं घर के लिए चल पड़ी। आज राहुल को नही आना था। रविवार की छुट्टी थी इसलिए वो अपने घर गया था। वैसे हर रविवार को नही जाता है पर आज गया था। उसने बताया था एक बार अपने परिवार के बारे में। बड़ा परिवार था इसलिए अगर हर रविवार ना भी जाए तो ऐसी कोई बात नही थी। घर के बारे में सोचते सोचते घर पहुंच गई। सब कुछ सामान्य ही था। भाई घर पे नही था। मां ने बताया कि वो अपने कुछ दोस्तों से मिलने गया है। कल उसे जाना था इसलिए शायद गया हो मिलने। मेरी दिनचर्या तो सब रोज की तरह ही थी। सोचा था कुछ अच्छा और नया सोचूंगी और करूंगी लेकिन अब तो कोई रास्ता नही दिख रहा था। मैं भी ऊब चुकी थी समझौता करते करते। लेकिन आज की इस परिस्थिति को मैं समझौता नही बल्कि विवशता कहूं तो बेहतर है। थोड़ी देर बाद भाई आ गया। सब लोग साथ में बैठ कर खाना खाए और फिर सोने चले गए। सब ने बस सामान्य बातें ही की बातों बातों में ही भाई ने कल जाने की पुष्टि भी कर दी। वैसे उसने एक बार फिर अपनी मजबूरी बता कर मां और मुझे विश्वास में लेने की कोशिश की साथ में हम दोनो को चिंता ना करने को भी बोला। पर मैं और मां दोनो ही इस बात को बखूबी समझ रहे थे कि रोज घर वापस आने में और सप्ताह ने एक बार आने में अंतर होता है। कोई भी कुछ कर भी क्या सकता था।
सुबह उठी तो सब लोग मुझसे पहले ही जग चुके थे। सब कुछ सामान्य ही था रोज की तरह। भाई के जाने का समय हो गया। वो तैयार तो पहले ही हो चुका था। मां ने रोज की तरह ही मेरे लिए और भाई के लिए लंच बॉक्स तैयार कर दिया था। भाई ने लंच बॉक्स लिया , अपना ऑफिस वाला बैग लिया फिर उसने मां के पैर छुए , मेरे सर पर हाथ रखा और चल दिया। मां तो लगभग रोने ही वाली थी। मैने मां का हाथ जोरों से पकड़ लिया तो वो रोते रोते रह गई। भाई जा चुका था लेकिन मां और मैं थोड़ी देर वहीं खड़े रहे , भाई को जाता देखते रहे। घर के अंदर आते ही मां खुद को नही रोक पाई और रोने लगी। रोते रोते ही बोली
- आज तेरे पापा की बहुत याद आ रही है। बिल्कुल अकेली हो गई हूं मैं।
- ऐसा मत कहो मां, मैं हूं साथ में और भाई भी आता जाता रहेगा। वो साथ नही है लेकिन अपना ही है।
- तुम कब तक रहोगी साथ। एक दिन तो तुम्हे भी जाना ही है। तुम्हारे पापा नही हैं। भगवान से मेरी प्रार्थना है कि मुझे कम से कम समय उस समय तक जीवित रखें कि मैं तुम्हारी विवाह कर सकूं।
ऐसा बोल के वो मुझसे लिपट गई और बेतहासा रोने लगी। मैने मां को इस तरह रोते पहले कभी नहीं देखा था। जिस दिन पिताजी नही रहे थे उस दिन भी वो इतना नही रोई थी। मैने किसी तरह मां को शांत किया। मैने मां से कहा कि आज मेरा मन नहीं है दुकान जाने का , आज घर पर ही रहूंगी। मां ने भी कहा कि ठीक है मत जाओ।
थोड़ी देर बाद रामू घर आ गया। हमेशा जब कभी भी दुकान बंद रहना होता था तो वो एक दिन पहले ही निश्चित रहता था और रामू को पता होता था। आज बिना किसी पूर्व योजना के दुकान बंद करना था। तो रामू दुकान बंद देखकर घर ही आ गया। मैने रामू को सब समझा के भेज दिया। मैने उससे कह दिया कि कल वो उसी समय आ जाय दुकान पर। आज नही लेकिन कल दुकान खुलेगी। रामू चला गया।
मैं पूरा दिन घर पे ही रही मां के साथ। आज खाना भी मैने ही बनाया। मां के साथ पूरा दिन बातें की। पापा के बारे में, भाई के बारे में, अपने बारे मे बहुत सी बातें की। मां ने भी पुरानी बहुत सी बातों की याद दिलाई। शाम हो गई। मां का मन कुछ हल्का लग रहा था। मुझे लगा कि आज दुकान ना जाकर मैने अच्छा ही किया। शाम को साथ बैठकर चाय पिया। साथ में बैठकर टी वी देखा। खाना वाना खा लिया। अब सोने का समय था। मैने मां से कहा
- मां मैं आज तुम्हारे साथ ही सो जाऊं ?
- ठीक है।
और फिर मैं मां के साथ मां के कमरे में ही सोने आ गई। मुझे नींद आने लगी तो एक बार मां की तरफ देखा। मां की आंखें नम थीं। मैने मां को कस के पकड़ लिया और मां को पकड़े पकड़े कब नींद आ गई पता ही ना चला। आज मां के साथ सोकर बहुत अच्छा लगा। एक छोटी सी बच्ची होने का एहसास हो रहा था।
सुबह हो गई। मेरे दुकान जाने का समय हो गया। आज तो जाना ही था। रोज की तरह मां ने लंच बॉक्स तैयार कर दिया था। आज मां को एक ही लंच बॉक्स तैयार करना था। मां को जरूर अजीब लगा होगा पर मैने मां से इस बारे में कुछ ना बोलना ही उचित समझा। अपना लंच बॉक्स लिया और दुकान के लिए चल पड़ी।






