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Friday, June 7, 2024

हम कुछ हैं 36

सुबह उगते सूरज के साथ 

ये एहसास होता है कि

हम भी कुछ हैं। 

सूरज चढ़ते रहने के साथ

कुछ होने का एहसास भी

निरंतर बढ़ता जाता है।

फिर एक समय आता है

कुछ होने का एहसास

चरम सीमा पर पहुंचता है।

सूरज नीचे ढलने लगता है।

फिर प्रारंभ हो जाता है

कुछ ना होने का एहसास।

शाम सूरज ढल जाने पर 

ये एहसास होता है कि 

कुछ भी नहीं हैं हम।

शाम के बाद रात आती है

हम भी सो जाते है

फिर सुबह कुछ होने के लिए।

फलसफे 35

 रहे ख्यालों में ख्वाबों में जो नहीं आए।

सवाल वो थे जवाबों में जो नहीं आए।


लिए हिसाब मैं बैठा हूं बीते लम्हों का

न जाने कैसे हिसाबों में जो नहीं आए।


जुर्म जिसने किए चेहरा छुपाए बैठे थे

फंस गए वो नकाबों में जो नहीं आए।


खुद अपनी बेबसी पर कुढ़ते ही रहे 

वो कांटे गुलाबों में जो नहीं आए।


कुछ ऐसे भी फलसफे हैं दुनियादारी के

रहे जुबां पे किताबों में जो नहीं आए।

पैगाम लिखता हूं। 34

कुछ भी हो हर सफर का अंजाम लिखता हूँ।

थके पैरों के जानिब से कोई मक़ाम लिखता हूँ।

जिल ना मिले तो इसका गिला रास्तों से क्यूं

खुद अपने ही सर मैं सारे इल्जाम लिखता हूँ।

हर शाम को मालूम है कि आएगी सहर भी

अंधेरों की हर कोशिश को नाकाम लिखता हूँ।

शायद वो लफ्ज़ों को अपने दिल से पढ़ता है

बस यही सोचकर मैं उसको पैगाम लिखता हूँ।

नहीं मिलती हैं दुआएं किसी भी बाजार में

चलो मैं अपनी दुआएं सभी के नाम लिखता हूँ