कुछ भी हो हर सफर का अंजाम लिखता हूँ।
थके पैरों के जानिब से कोई मक़ाम लिखता हूँ।
जिल ना मिले तो इसका गिला रास्तों से क्यूं
खुद अपने ही सर मैं सारे इल्जाम लिखता हूँ।
हर शाम को मालूम है कि आएगी सहर भी
अंधेरों की हर कोशिश को नाकाम लिखता हूँ।
शायद वो लफ्ज़ों को अपने दिल से पढ़ता है
बस यही सोचकर मैं उसको पैगाम लिखता हूँ।
नहीं मिलती हैं दुआएं किसी भी बाजार में
चलो मैं अपनी दुआएं सभी के नाम लिखता हूँ
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