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Tuesday, August 23, 2022

क्यों तुम इतने दूर हुये

 इतने क्यों मजबूर हुये।

अपनो से ही दूर हुये।

कुछ ही दिन तो बीते हैं 

तुमको यूं मशहूर हुये।


जज्बात मे तर्क नही होते।

हर बात के अर्थ नही होते।

निर्भर सब विश्वास पे है

रिश्तों मे शर्त नही होते।

लेकिन जो तुमने रखे हैं

सब शर्त मे हमे मंजूर हुये।

क्यों तुम इतने दूर हुये।


शिकवा और शिकायत हो।

ये भी एक रवायत हो।

दिल पर कोई बोझ नही

यह भी एक हिदायत हो।

कुछ खट्टी मीठी बातें ही 

क्या रिश्तों मे नासूर हुये

क्यों तुम इतने दूर हुये।

हौसला

               


( बिहार की एक बालिका जो किसी दुर्घटना मे अपना एक पांव गंवा चुकी है लेकिन शिक्षा के प्रति , पढ़ाई के प्रति , ज्ञान के प्रति अपने हौसले को नही गंवाया। एक पैर पर ही कूद कूद कर अपने घर से एक किलोमीटर दूर स्थित अपने स्कूल रोज जाती है। ये कविता उसी बालिका और उसके हौसले को समर्पित है। ) 

है नही एक पांव तो भी क्या हुआ।

दूर अपना गांव तो भी  क्या हुआ।।

ज्ञात है मुझको मेरी जीवन दिशा।

है सुदृढ अपनी बहुत जिजीविषा।।

मूल्य शिक्षा का मुझे मालूम है।

मेरी इच्छा का मुझे मालूम है।।

है ललक स्कूल जाने की मुझे।

खुद मे कुछ कर दिखाने की मुझे।।

ये मेरा स्कूल घर से दूर है।

चाह शिक्षा की मगर भरपूर है।।

एक ही पांव पर कूद कूद कर।

जाती हूं स्कूल खुशी से झूम कर।।

क्या हुआ जो मैं बहुत विपन्न हूं।

उत्साह से उल्लास से संपन्न हूं।

अपने वश मे जो है मैं तो कर रही।

पर समय से भी मैं थोड़ा डर रही।।

लक्ष्य मेरा क्या मुझे मिल पायेगा।

फूल शिक्षा का मेरा खिल पायेगा।।

जो भी हो पर अब रुकुंगी मैं नही।

परिस्थितियों के आगे झुकूंगी मैं नही।।

दिन मेरा भी एक दिन तो आयेगा।

नाम मेरा दुनिया पर छा जायेगा।।

नाम मेरा दुनिया पर छा जायेगा।।

प्रतिस्पर्धा

 एक प्रतिस्पर्धा रहती है 

ख्वाबों व अश्कों के मध्य

छिड़ ही जाता है एक द्वंद

अक्सर ही मेरी आंखों मे।

कभी हारते अश्क सभी

जीत ही जाते ख्वाब मेरे।

कभी हारते ख्वाब सभी

जीत ही जाते अश्क मेरे।

अपनी भी एक विवशता है

एक अपनापन दोनो से है।

असमय अनचाहे रार मे

दोनो के ही तकरार मे

मेरी भूमिका बस इतनी 

एक मूक समर्थन दोनो को 

कोई हारे कोई जीते।

दोनो ही हैं स्वीकार मुझे।