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Saturday, December 28, 2024

बादलों को खत लिखा। 51

बादलों को खत लिखा

क्यों छुपाते हो ग़मो को।।

दाग गहरे हो लिए तुम

खोल दो सारे भ्रमों को।

साथ ले इतने ग़मों को

कब तलक तुम यूं फिरोगे।

वो समय भी आयेगा ही 

अश्रु बनकर तुम गिरोगे।

मेरी आंखों में भी शायद 

काले बादल कुछ छुपे हैं।

जाने कितने प्रश्न हैं पर 

बुंदों में ही हल छुपे हैं।

बात बस इतनी लिखी

कि सारे बादल रो दिए।

आंसुओं का रूप ले

सारे गमों को धो दिए।

मन 50

मन ही जाने मन के भीतर चलता क्या है।

मन की दीवारों पर उठता गिरता क्या है।

मन की अपनी भाषा है

आशा और निराशा है।

सब प्रश्नों के उत्तर मन में

मन में ही जिज्ञासा है।

किस में है वो सफल और विफलता क्या है।

मन ही जाने मन के भीतर चलता क्या है।

कुछ ना उसकी थाह चले

मन अपनी प्रवाह चले।

कोई निश्चित दिशा नहीं

मन अनंत की राह चले।

खुद उसमें ही जलता और पिघलता क्या है।

मन ही जाने मन के भीतर चलता क्या है।

सवालात 49

खुद अपने ज़मीर से भी कभी बात कीजिए।

बस यूं ही कभी खुद से मुलाकात कीजिए।


अश्कों में छिपी बात समझता नही कोई

बेवजह ही आंखों से ना बरसात कीजिए।


जो वक्त गुजर जाएगा वापस ना आएगा

बेकार की बातों में ना दिन रात कीजिए।


मुमकिन तो है गैरों में कुछ खामियां मगर 

गर हो सके खुद से भी सवालात कीजिए।


कुछ बात हो गई है तो दिल से निकालिए

हर बात पर ऐसे ना फ़सादात कीजिए।


अब रूबरू बैठे हैं तो चुपचाप ना रहिए 

बेबात ही सही मगर कुछ बात कीजिए।

जीवन सागर 48

जीवन सागर हम हैं कश्ती 

बहते किसी सहारे।

बहते बहते लग जाएंगे

हम भी किसी किनारे।।

कश्ती की अपनी किस्मत है

जाने कौन दिशा में जाए।

संग नही है कोई उसके

आकर उसको राह बताए।

उठती गिरती लहरों में ही

छिपे हैं सभी इशारे। 

जीवन सागर हम हैं कश्ती

बहते किसी सहारे।।

फंसेगी जब वो बीच भंवर में

आकर कोई निकालेगा।

इतना तो उम्मीद हमे है

कश्ती कोई बचा लेगा।

दूर दूर तक दिखे ना कोई

किसको कौन पुकारे।

बहते बहते लग जाएंगे

हम भी किसी किनारे।।

अपने मन की कहना है। 47

अपने मन की कहना है।

कभी कभी चुप रहना है।


कभी तो होगी तेज धूप 

और कभी रहे ठंडी छाया।

धूप - छांव का आना जाना

कुछ ना कुछ तो सहना है।


दुख अगर आया है तो फिर

सुख भी एक दिन आयेगा।

दुख के पर्वत बड़े हों कितने

इक ना इक दिन तो ढहना है।


समय एक सा नहीं है रहता

समय बदलना निश्चित है।

यूं ही समय के धारे के संग

हमे निरंतर बहना है।


एक शक्ल जो मिला है शायद

उससे काम नहीं चलता।

कोई ना कोई मुखौटा सबने

कभी ना कभी तो पहना है।

पूर्ण विराम 46

अर्ध विराम;

अल्प विराम,

प्रश्न सूचक?

विस्मयादिबोधक !

हर पर हर क्षण

व्याकरण चिन्हों से

भरा ये जीवन 

अग्रसर रहता है

एक बड़े चिन्ह 

पूर्ण विराम की तरफ।

अपने अपने हाल निकालो 45

मन से सभी बवाल निकालो।

बालों के मत खाल निकालो।

अनसुलझे जो पड़े हुए हैं 

ऐसे सभी सवाल निकालो।


दुविधाओं से शंकाओं से

अंतर्मन यदि भरा हुआ हो।

खुशियों की यूं राह न रोको

मन से सब जंजाल निकालो।


जीवन की शतरंज बिछी है

सुख और दुख में बाजी है।

दुख हारे और सुख ही जीते

ऐसी कोई चाल निकालो।


है मशरूफ बहुत ये दुनिया

किसको किसकी पड़ी यहां।

अपने मन में खुद ही झांको

अपने अपने हाल निकालो।