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Saturday, December 28, 2024

अपने मन की कहना है। 47

अपने मन की कहना है।

कभी कभी चुप रहना है।


कभी तो होगी तेज धूप 

और कभी रहे ठंडी छाया।

धूप - छांव का आना जाना

कुछ ना कुछ तो सहना है।


दुख अगर आया है तो फिर

सुख भी एक दिन आयेगा।

दुख के पर्वत बड़े हों कितने

इक ना इक दिन तो ढहना है।


समय एक सा नहीं है रहता

समय बदलना निश्चित है।

यूं ही समय के धारे के संग

हमे निरंतर बहना है।


एक शक्ल जो मिला है शायद

उससे काम नहीं चलता।

कोई ना कोई मुखौटा सबने

कभी ना कभी तो पहना है।

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