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Saturday, December 13, 2025
शब्द-संरक्षण 65 / 66
अदृश्य टोकरी 64
एक अदृश्य टोकरी में
बेतरतीब सी पड़ी है
कुछ चीजें नायाब।
कुछ बेआवाज शब्द।
कुछ बीते हुए लम्हे
थोड़े बहुत अश्क।
थोड़ी सी निराशाएं
और कुछ आशाएं।
कुछ टूटी हुई नींदें
आधे -अधूरे ख्वाब।
एक अदृश्य टोकरी में
बेतरतीब से पड़ी हैं
कुछ चीजें नायाब।
जीवन के अनुभव 63
जीवन के अनुभव
जीवन भर चलते हैं।
कभी गिरते हैं
फिर उठते हैं।
कभी टूटते है
फिर जुड़ते है।
कभी बिखरते हैं
फिर सिमटते हैं।
टूटकर जुड़ते हुए
गिरकर उठते हुए
बिखरकर सिमटते हुए
हम हर पल निखरते हैं।
जीवन के अनुभव
जीवन भर चलते हैं।
जीवन एक अंधी सुरंग 62
जीवन है एक अंधी सुरंग,
हम सब उसमें फंसे मुसाफिर,
या कभी-कभी,
शिकार की तरह,
छिपे, हारे, अनजाने में।
सुरंग का आरंभ कौन जानता?
सुरंग का अंत कौन देख पाया?
यहाँ आना भी अनचाहा,
फंस जाना भी अनचाहा,
और निकलना…
यह भी हमारे वश में नहीं।
फिर भी एक सत्य है अनिवार्य,
हम निकलेंगे,
सूरज की किरणों की तरह,
लेकिन कौन हाथ थामेगा,
और कहाँ ले जाएगा ,
यह भी कोई नहीं जानता।
अपनी अपनी दुनिया 61
कहने को दुनिया एक ही है,
पर हर व्यक्ति
अपनी ही रची हुई दुनिया में बसता है—
एक निजी आकाश,
एक निजी मौसम,
जहाँ समाज, सोच, समय
सब कुछ अपनी इच्छा से आकार लेता है।
तो क्या सचमुच एक ही दुनिया है?
या हर मन भीतर
एक नई दुनिया जन्म देती है?
शायद सर्वमान्य दुनिया
सिर्फ एक शब्द है—
एक ऐसा नाम
जिसका कोई निश्चित आकार नहीं,
कोई ठोस अस्तित्व नहीं;
एक अवधारणा,
जिसे हम दुनिया कहते तो हैं,
पर जीते—
हम अपनी ही दुनिया में हैं।
जीवन समीकरण 60
कुछ ठीक हो,
या न भी हो—
पर मैं गणित का नियम से
पहले मान लूंगा कि
सब कुछ ठीक है।
फिर हल करूंगा
जीवन के जटिल से समीकरण।
क्या पता किसी पल
उत्तर भी मुस्कुरा दे,
और जो मान मन में धरा था,
वही सत्य मान निकल आए।
चश्मा बदलते रहिए 59
खुली आँखें तो वही दिखाती हैं
जो भीड़ रोज़ देखती है।
सच को थोड़ा गहराई से देखना हो
तो चश्मा बदलिए—
एक नहीं, कई-कई।
समय बदले, परिस्थितियां बदले,
तो चश्मा भी बदलना चाहिए।
पर मैं उस चश्मे की बात कहाँ कर रहा
जो दुकान में मिल जाता है—
जनता की आँखों पर चढ़ाया-उतारा जाता है।
एक चश्मा लगाइए मन पर,
एक अंतरात्मा की धूल पोंछने को,
एक बुद्धि के कोने-कोने में
जमा भ्रम को साफ करने को।
फिर जो दिखाई देगा,
वह आँखों का खेल नहीं होगा—
वह सच होगा,
जिसे देखने से लोग
ज़्यादातर कतराते हैं।
प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष 58
कभी-कभी
गलती प्रत्यक्ष करता है,
लेकिन स्क्रिप्ट
अप्रत्यक्ष लिखता है।
कटघरे में खड़ा होता है
प्रत्यक्ष,
फैसला भी उसी पर होता है।
और पर्दे के पीछे
तालियाँ बजाता हुआ
ठहाके लगाता है
अप्रत्यक्ष।