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Monday, May 20, 2024

तुमसे परिभाषित शब्द मेरे 30

तुमसे परिभाषित शब्द मेरे

हर शब्द में हो परिभाषित तुम।

शब्दों में छिपे हैं अर्थ बहुत 

हर अर्थ में हो अनुवादित तुम।


जो गुजर गया सो गुजर गया

शब्दों में उनकी यादें है।

जो होना था पर नही हुआ

शब्दों में बस फरियादें हैं।

जो अर्थ हैं मेरे शब्दों के 

हर अर्थ में हो रेखांकित तुम।

हर शब्द में हो परिभाषित तुम।


गर शब्द समझ में आएगा

तो अर्थ समझ में आएगा।

क्या कह सकते हैं शब्दों से 

सामर्थ्य समझ में आएगा।

कितने भी विस्तृत अर्थ सही

हर अर्थ में हो प्रत्याशित तुम।

हर शब्द में हो परिभाषित तुम।

मेरे शब्दों ध्यान रहे 29

 मेरे शब्दों ध्यान रहे !

तुम मर्यादित ही रहना।

चाहे निकलो लेखनी से

या फिर जिह्वा से निकलो।

पाषाणी शब्दों के सम्मुख

हिम जैसा ही तुम पिघलो।

कहने को कुछ भी कहना 

पर सोच समझ कर कहना।

मेरे शब्दों ध्यान रहे !

तुम मर्यादित ही रहना।


अर्थ अनर्थ ना हो पाए 

एक निश्चित अर्थ तुम्हारा हो। 

जो भी कहना चाहो कह दो 

कोशिश ना व्यर्थ तुम्हारा हो।

हृदय से निकले भावों से

तुम अनुवादित ही रहना।

मेरे शब्दों ध्यान रहे !

तुम मर्यादित ही रहना।

तुम मर्यादित ही रहना।

जज़्बात मैं कैसे लिख दूं। 28

 इतनी बातें हैं कि हर बात मैं कैसे लिख दूं।

है ज़मीं सूखी तो बरसात मैं कैसे लिख दूं।


 ख्वाब आए नही और नींद भी नहीं आई

ऐसी रातों को भला रात मैं कैसे लिख दूं।


जाने क्यों आजकल वो क्यूं उदास रहता है

दिल के बिगड़े हुए हालात मैं कैसे लिख दूं।


कुछ तो बातें थीं जो होठों पे आ नही पाईं 

अपने वो सारे ही जज़्बात मैं कैसे लिख दूं।


वो तो आंखों से बयां करते है शिकवे अपने

अपने दिल के भी सवालात मैं कैसे लिख दूं।

मैं और मेरी रचनाएं । 27

बहुत आसान नहीं होता है
अपनी बातें खुद से कहना।
अपनी बातें खुद को लिखना।
यूं ही मैं कविताएं लिखता हूं।
गीत और गजल लिखता हूं।
ख्वाबों के महल लिखता हूं।
कभी कुछ बात लिखता हूं 
कभी बेबात लिखता हूं।
कुछ यहां के कुछ वहां के 
मुकम्मल हालात लिखता हूं।
आंखों में ख्वाब लिखता हूं।
अनगिनत सी यादें है दिल में
उनका हिसाब लिखता हूं।
कुछ कहानियां लिखता हूं
कुछ किस्से लिखता हूं।
कुछ दर्द कुछ यादें 
कुछ खुशियां कुछ गम 
मैं अपने हिस्से लिखता हूं।

एहतराम 26

यूं जिंदगी तमाम किए जा रहे हैं हम।

खुद से ही इंतकाम लिए जा रहे हैं हम।


पल भर की जिंदगी का कुछ भी पता नही

सदियों का इंतजाम किए जा रहे हैं हम।


हमने ही बनाए हुए हैं सब अपने मसअले 

सबको ही ये इल्जाम दिए जा रहे हैं हम।


वो एक नाम जुबां पर जो आ ही नही रहा

दिल में वही एक नाम लिए जा रहे हैं हम।


क्या सोचना कि कौन है कैसा मेरे लिए

सबका ही एहतराम किए जा रहा हैं हम।