मेरे शब्दों ध्यान रहे !
तुम मर्यादित ही रहना।
चाहे निकलो लेखनी से
या फिर जिह्वा से निकलो।
पाषाणी शब्दों के सम्मुख
हिम जैसा ही तुम पिघलो।
कहने को कुछ भी कहना
पर सोच समझ कर कहना।
मेरे शब्दों ध्यान रहे !
तुम मर्यादित ही रहना।
अर्थ अनर्थ ना हो पाए
एक निश्चित अर्थ तुम्हारा हो।
जो भी कहना चाहो कह दो
कोशिश ना व्यर्थ तुम्हारा हो।
हृदय से निकले भावों से
तुम अनुवादित ही रहना।
मेरे शब्दों ध्यान रहे !
तुम मर्यादित ही रहना।
तुम मर्यादित ही रहना।
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