शांत समंदर ऊंची लहरें कैसे हों।
भूख से व्याकुल ख्वाब सुनहरे कैसे हों।
तन पर वस्त्रों का चाहे आभाव सही
कोई बताये पेट पे पहरे कैसे हों।
सारा जीवन क्या संघर्षों मे बीतेगा।
खुद से हार कर क्या खुद ही से जीतेगा।
भाग्य का लेखा कैसे कोई टाल सके
इनके भी संसार रूपहले कैसे हों।
भूख से व्याकुल ख्वाब सुनहरे कैसे हों।
है कलंक लकीरों का जो हटा नही।
क्या होगा इनके भविष्य का पता नही।
ये आखिर शिक्षा से क्यों दूर रहें
होठों पर इनके भी ककहरे कैसे हों।
इनके भी संसार रूपहलें कैसे हों।
