आना हुए हैं बन्द जो पैगाम तुम्हारे।
ख्वाबों को सभी कर दिया है नाम तुम्हारे।
मशरूफ जिन्दगी से है शिकवा बहुत मुझे
जो आ न सका कोई कभी काम तुम्हारे।
दो चार कदम तुम जो मेरे साथ चले हो
उतरेंगे भला कैसे ये एहसान तुम्हारे।
अब कैसे बताऊं तुम्हे ये सच तो नही हैं।
मुझ पर लगे हैं जो सभी इल्जाम तुम्हारे।
लिक्खे थे हमे तुमने जो बेनाम ही कभी
अब पूछ रहे खत सभी पहचान तुम्हारे।
