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Tuesday, February 4, 2025

अजब हालात 54

 जाने कितनी बातें हैं हर बात कोई क्या कहे।

है जमीं सूखी तो फिर बरसात कोई क्या कहे।


नींद भी आई नहीं और ख्वाब भी हैं लापता

रात गर ऐसी हो उसको रात कोई क्या कहे।


है नहीं मुमकिन समझना जिंदगी के खेल को

कब वो देगा कौन सी सौगात कोई क्या कहे।


क्या करें क्या ना करें कुछ भी समझ आए नहीं

ऐसे भी आ जाते हैं लम्हात कोई क्या कहे।


हैं यहां कुछ लोग जो खुद को समझते हैं खुदा

हैं ज़माने के अजब हालात कोई क्या कहे।

उलझन 53

देखिए ये दिन भी ढलता जा रहा है।

बस यूं ही सब कुछ बदलता जा रहा है।


कुछ भरोसा है नहीं अब वक्त का भी

वक्त हाथों से निकलता जा रहा है।


रास्ते  पर चल रहा हर आदमी

रास्तों में ही उलझता जा रहा है।


जिंदगी की चाह में हर शय यहां

थोड़ा थोड़ा रोज़ मरता जा रहा है।


तोहमतें अपनों ने इतने हैं लगाए

दिल पे अब बोझ बढ़ता जा रहा है।

हज़ार ख्वाब 52

 ना जाने क्या मेरे अहबाब लिए बैठे हैं।

बीते लम्हों का भी हिसाब लिए बैठे हैं।


अपनी जमीं है सबकी सबके हैं आस्मां 

सब के सब एक आफताब लिए बैठे हैं


रहती है पलकों को हर वक्त शिकायत

क्यूं आंखों में हज़ार ख्वाब लिए बैठे हैं।


अश्कों का ले लेते हैं अक्सर ही सहारा

वो जो दिल में कोई सैलाब लिए बैठे हैं।


रखते हैं अपने साथ जो खंज़र मेरे लिए

हम उनकी राह में गुलाब लिए बैठे हैं।


गुजरती थी नागवार जिन्हें मेरी शायरी

वो आज मेरी ही किताब लिए बैठे हैं।