जाने कितनी बातें हैं हर बात कोई क्या कहे।
है जमीं सूखी तो फिर बरसात कोई क्या कहे।
नींद भी आई नहीं और ख्वाब भी हैं लापता
रात गर ऐसी हो उसको रात कोई क्या कहे।
है नहीं मुमकिन समझना जिंदगी के खेल को
कब वो देगा कौन सी सौगात कोई क्या कहे।
क्या करें क्या ना करें कुछ भी समझ आए नहीं
ऐसे भी आ जाते हैं लम्हात कोई क्या कहे।
हैं यहां कुछ लोग जो खुद को समझते हैं खुदा
हैं ज़माने के अजब हालात कोई क्या कहे।