ना जाने क्या मेरे अहबाब लिए बैठे हैं।
बीते लम्हों का भी हिसाब लिए बैठे हैं।
अपनी जमीं है सबकी सबके हैं आस्मां
सब के सब एक आफताब लिए बैठे हैं
रहती है पलकों को हर वक्त शिकायत
क्यूं आंखों में हज़ार ख्वाब लिए बैठे हैं।
अश्कों का ले लेते हैं अक्सर ही सहारा
वो जो दिल में कोई सैलाब लिए बैठे हैं।
रखते हैं अपने साथ जो खंज़र मेरे लिए
हम उनकी राह में गुलाब लिए बैठे हैं।
गुजरती थी नागवार जिन्हें मेरी शायरी
वो आज मेरी ही किताब लिए बैठे हैं।
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