सूनी सूनी सी मैं हर डगर ढूंढता हूं।
मैं कहां हूं मैं अपनी खबर ढूंढता हूं।
हो सफर ज़िंदगी का न कांटों भरा
मैं बस ऐसा कोई रहगुज़र ढूंढता हूं।
ग़म की रातों पे हमको भरोसा नही
शाम होने से पहले सहर ढूंढता हूं।
जाने क्यूं ज़िंदगी है खफा आजकल
कहां रह गई है मुझसे कसर ढूंढता हूं।
कोई लम्हा जो दिल को सुकूँ दे सके
बस वही हर घड़ी हर पहर ढूंढता हूं।