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Monday, August 5, 2024

रहगुजार ढूंढता हूं 44

सूनी सूनी सी मैं हर डगर ढूंढता हूं।

मैं कहां हूं मैं अपनी खबर ढूंढता हूं।


हो सफर ज़िंदगी का न कांटों भरा

मैं बस ऐसा कोई रहगुज़र ढूंढता हूं।


ग़म की रातों पे हमको भरोसा नही

शाम होने से पहले सहर ढूंढता हूं।


जाने क्यूं ज़िंदगी है खफा आजकल

कहां रह गई है मुझसे कसर ढूंढता हूं।


कोई लम्हा जो दिल को सुकूँ दे सके

बस वही हर घड़ी हर पहर ढूंढता हूं।

जिंदगी इम्तिहान लेती है। 43

 जिंदगी इम्तिहान लेती है।

पर इम्तिहान के पहले

कभी नहीं बताती 

इम्तिहान का शेड्यूल।

इम्तिहान का सिलेबस।

कब शुरू होगा।

कितने दिन चलेगा

कब खत्म होगा 

मूल्यांकन कैसे होगा।

कुछ भी नहीं बताती।

इसी बहाने जिंदगी 

हमें जान लेती है।

हमें पहचान लेती है।

जिंदगी इम्तिहान लेती है।

क्या करें ! 42

कोई नहीं है अपना ग़मख़्वार क्या करें।

रिश्तों में उठ गई जो दीवार क्या करें।


बादल हैं छंट गए पर धूप निकलने के

दिखते नहीं हैं कोई आसार क्या करें।


हर ग़म में या खुशी में जो साथ थे मेरे

अब कर रहे है वो भी इन्कार क्या करें।


कश्ती भी भंवर में है रूठा है नाख़ुदा

हाथों में नहीं कोई पतवार क्या करें।


अब दिन भी गुजरते हैं यूं ही किसी तरह

लंबी है कुछ गमों की कतार क्या करें।


अपनी ही जिंदगी से जब जंग छिड़ी हो

फिर जीत क्या करें और हार क्या करें।


सब बेच कर ग़मों को खुशियां खरीद लें

ऐसा नहीं है कोई बाजार क्या करें।

आवागमन 41

एक दुनिया इस तरफ

एक दुनिया उस तरफ

दोनो एक दूसरे से

पूर्णतया अपरिचित

बीच में अपरिभाषित

एक शून्य या अनंत 

सांस चले तो ये दुनिया

सांस रुके तो वो दुनिया

इससे उत्तम आवागमन

शायद कोई नही।

कोई नही।