ENJOY READING, GO IN DREAMS


Monday, August 5, 2024

क्या करें ! 42

कोई नहीं है अपना ग़मख़्वार क्या करें।

रिश्तों में उठ गई जो दीवार क्या करें।


बादल हैं छंट गए पर धूप निकलने के

दिखते नहीं हैं कोई आसार क्या करें।


हर ग़म में या खुशी में जो साथ थे मेरे

अब कर रहे है वो भी इन्कार क्या करें।


कश्ती भी भंवर में है रूठा है नाख़ुदा

हाथों में नहीं कोई पतवार क्या करें।


अब दिन भी गुजरते हैं यूं ही किसी तरह

लंबी है कुछ गमों की कतार क्या करें।


अपनी ही जिंदगी से जब जंग छिड़ी हो

फिर जीत क्या करें और हार क्या करें।


सब बेच कर ग़मों को खुशियां खरीद लें

ऐसा नहीं है कोई बाजार क्या करें।

No comments:

Post a Comment