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Thursday, March 28, 2024

शब्द बहें पर अर्थ न बहने पाएं 25

दोनो पलकों के पीछे ही

एक बड़ा जल सागर है।

सागर की जल बूदों में

बसे हुए कुछ शब्द मेरे।

अपनी किसी वेदना में 

या दिल की संवेदना में

बूदें जब बहने पर आएं।

बस एक निवेदन है मेरा

ना शब्द मेरे बहने पाएं।

शब्द अगर बह भी गए 

तो वापस वो आ जाएंगे

ख्याल रहे बस इतना ही

कि शब्दों के बहते बहते 

ना अर्थ कभी बहने पाएं।

अर्थ अगर बह गए साथ

तो वापस वो ना आयेंगे

आए भी तो निश्चित ही

फिर मूल अर्थ खो जायेंगे।

वो अर्थ न वापस आयेंगे।

Sunday, March 24, 2024

झील में चांद 24

 ज़िंदगी तुमको निखरना होगा।

बस थोड़ा और बिखरना होगा।


सामने वो हैं आ गए शायद

अब तुम्हे आह भी भरना होगा।


झील में चांद उतर आया है 

उसे भी आज संवरना होगा।


एक नज़र यूं ही देखने के लिए

उसकी राहों से गुजरना होगा।


दिल उसे भूल रहा है अब तो

फिर से ज़ख्मों को उभरना होगा।

इबारत 23

 दिल में यादों की है छोटी सी रियासत अपनी।

यही इतनी सी है अनमोल अमानत अपनी।


उन्हे ही सोच लिया उनसे ही बातें कर लीं 

ऐसा लगता है मुकम्मल है इबादत अपनी।


अब तो दीवारों पर ही बोझ टिका है सारा

जवाब दे गई शहतीरे-ए-इमारत अपनी।


न जाने क्यों मेरी तरफ ही हैं सबकी नजरें

नही किसी से है दुनिया में अदावत अपनी।


जिनका वादा था मुश्किलों में साथ देने का

नहीं मालूम था करेंगे खिलाफत अपनी।


अपने हाथों की लकीरों पे यकीं है मुझको

कोई तो लिखता है तकदीर-ए-इबारत अपनी।


वो जो सुनता ही है हर शख्स की दुआवों में

वही करेगा बलाओं से हिफाजत अपनी।