दिल में यादों की है छोटी सी रियासत अपनी।
यही इतनी सी है अनमोल अमानत अपनी।
उन्हे ही सोच लिया उनसे ही बातें कर लीं
ऐसा लगता है मुकम्मल है इबादत अपनी।
अब तो दीवारों पर ही बोझ टिका है सारा
जवाब दे गई शहतीरे-ए-इमारत अपनी।
न जाने क्यों मेरी तरफ ही हैं सबकी नजरें
नही किसी से है दुनिया में अदावत अपनी।
जिनका वादा था मुश्किलों में साथ देने का
नहीं मालूम था करेंगे खिलाफत अपनी।
अपने हाथों की लकीरों पे यकीं है मुझको
कोई तो लिखता है तकदीर-ए-इबारत अपनी।
वो जो सुनता ही है हर शख्स की दुआवों में
वही करेगा बलाओं से हिफाजत अपनी।
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