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Saturday, December 13, 2025

अपनी अपनी दुनिया 61

कहने को दुनिया एक ही है,

पर हर व्यक्ति

अपनी ही रची हुई दुनिया में बसता है—

एक निजी आकाश,

एक निजी मौसम,

जहाँ समाज, सोच, समय

सब कुछ अपनी इच्छा से आकार लेता है।


तो क्या सचमुच एक ही दुनिया है?

या हर मन भीतर

एक नई दुनिया जन्म देती है?


शायद सर्वमान्य दुनिया

सिर्फ एक शब्द है—

एक ऐसा नाम

जिसका कोई निश्चित आकार नहीं,

कोई ठोस अस्तित्व नहीं;

एक अवधारणा,

जिसे हम दुनिया कहते तो हैं,

पर जीते—

हम अपनी ही दुनिया में हैं।

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