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Saturday, December 13, 2025

जीवन एक अंधी सुरंग 62

जीवन है एक अंधी सुरंग,

हम सब उसमें फंसे मुसाफिर,

या कभी-कभी,

शिकार की तरह,

छिपे, हारे, अनजाने में।


सुरंग का आरंभ कौन जानता?

सुरंग का अंत कौन देख पाया?

यहाँ आना भी अनचाहा,

फंस जाना भी अनचाहा,

और निकलना…

यह भी हमारे वश में नहीं।


फिर भी एक सत्य है अनिवार्य,

हम निकलेंगे,

सूरज की किरणों की तरह,

लेकिन कौन हाथ थामेगा,

और कहाँ ले जाएगा ,

यह भी कोई नहीं जानता।

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