खुली आँखें तो वही दिखाती हैं
जो भीड़ रोज़ देखती है।
सच को थोड़ा गहराई से देखना हो
तो चश्मा बदलिए—
एक नहीं, कई-कई।
समय बदले, परिस्थितियां बदले,
तो चश्मा भी बदलना चाहिए।
पर मैं उस चश्मे की बात कहाँ कर रहा
जो दुकान में मिल जाता है—
जनता की आँखों पर चढ़ाया-उतारा जाता है।
एक चश्मा लगाइए मन पर,
एक अंतरात्मा की धूल पोंछने को,
एक बुद्धि के कोने-कोने में
जमा भ्रम को साफ करने को।
फिर जो दिखाई देगा,
वह आँखों का खेल नहीं होगा—
वह सच होगा,
जिसे देखने से लोग
ज़्यादातर कतराते हैं।
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