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Saturday, December 13, 2025

चश्मा बदलते रहिए 59

 खुली आँखें तो वही दिखाती हैं

जो भीड़ रोज़ देखती है।

सच को थोड़ा गहराई से देखना हो

तो चश्मा बदलिए—

एक नहीं, कई-कई।


समय बदले, परिस्थितियां बदले,

तो चश्मा भी बदलना चाहिए।

पर मैं उस चश्मे की बात कहाँ कर रहा 

जो दुकान में मिल जाता है—

जनता की आँखों पर चढ़ाया-उतारा जाता है।


एक चश्मा लगाइए मन पर,

एक अंतरात्मा की धूल पोंछने को,

एक बुद्धि के कोने-कोने में

जमा भ्रम को साफ करने को।


फिर जो दिखाई देगा,

वह आँखों का खेल नहीं होगा—

वह सच होगा,

जिसे देखने से लोग

ज़्यादातर कतराते हैं।

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