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Friday, June 7, 2024

हम कुछ हैं 36

सुबह उगते सूरज के साथ 

ये एहसास होता है कि

हम भी कुछ हैं। 

सूरज चढ़ते रहने के साथ

कुछ होने का एहसास भी

निरंतर बढ़ता जाता है।

फिर एक समय आता है

कुछ होने का एहसास

चरम सीमा पर पहुंचता है।

सूरज नीचे ढलने लगता है।

फिर प्रारंभ हो जाता है

कुछ ना होने का एहसास।

शाम सूरज ढल जाने पर 

ये एहसास होता है कि 

कुछ भी नहीं हैं हम।

शाम के बाद रात आती है

हम भी सो जाते है

फिर सुबह कुछ होने के लिए।

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