आशाओं की रस्सी लेकर
आकांक्षाओं की लिये बाल्टी
चल पड़ता है अक्सर ये मन
सपनो के किसी कुएं पर।
रंग बिरंगे सपने भर भर
कुएँ से बाहर निकालता।
फिर धीमे से चुपके चुपके
आंखों मे है मेरी सजाता।
रात पहर जब आंखों के
अन्त:पुर के दरवाजे।
धीमे धीमे बन्द हुए
बिना किये कुछ आवाजें।
मन मेरा ले जाता मुझको
सपनो के एक नये सफर मे।
जो भी उसने चुने हुए हैं।
लिये बाल्टी भरे हुए हैं।
आशाओं की रस्सी ले
सपनो के गहरे कुएं से।
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