ENJOY READING, GO IN DREAMS


Tuesday, June 21, 2022

सपनों के गहरे कुएं से

 आशाओं की रस्सी लेकर 

आकांक्षाओं की लिये बाल्टी

चल पड़ता है अक्सर ये मन 

सपनो के किसी कुएं पर।

रंग बिरंगे सपने भर भर 

कुएँ से बाहर निकालता।

फिर धीमे से चुपके चुपके

आंखों मे है मेरी सजाता।

रात पहर जब आंखों के

अन्त:पुर के दरवाजे।

धीमे धीमे बन्द हुए

बिना किये कुछ आवाजें।

मन मेरा ले जाता मुझको

सपनो के एक नये सफर मे।

जो भी उसने चुने हुए हैं।

लिये बाल्टी भरे हुए हैं।

आशाओं की रस्सी ले

सपनो के गहरे कुएं से।

No comments:

Post a Comment