एक कली और फूल हूं मैं।
सब के ही अनुकूल हूं मैं।
मैं निर्भर नहीं हूं रंगों पर
मुझमें अपनी भी खूबी है।
मेरी ही महक सुगंध में तो
पूरी ही वाटिका डूबी है।
जितने भी फूल धरा पे हैं
मैं सबसे अधिक महकती हूं।
सब रंगों की भीड़ में भी
मैं बिल्कुल अलग सी दिखती हूं।
चाहे सुंदर शाम सुनहरी हो
या फिर हो रात की खामोशी।
मेरी सुगंध ही ऐसी है
जो फैला देती मदहोशी।
एक मोहक महक सुगंध लिए
हर आंगन की शान हूं मैं।
कुदरत को भी मिलने वाली
ईश्वर का एक वरदान हूं मैं।
बस एक छोटी सी पुष्प हूं मैं
है सुंदर श्वेत रंग मेरा।
सब फूलों से भी अलग हूं मैं
है अपना रंग ढंग मेरा।
सब धर्मों के पूजा स्थल
सुगंध से मेरी महकते हैं।
है गर्व बहुत मुझको इसका
ईश्वर मुझसे खुश रहते हैं।
कितने ही आंगन दरवाजे
मुझसे ही सुगंधित होते हैं।
बस एक सुगंधित पुष्प हूं मैं।
सब " जूही " मुझको कहते हैं।
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