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Wednesday, April 6, 2022

आंखें सपनो से बोल पड़ीं

                 

कल रात जब सपने आये 

आँखें सपनों से बोल पड़ीं 

बिना बात के बिना समय के 

ऐसे ही तुम आ जाते हो।

कुछ सच्ची झूठी बातों मे 

दिल को तुम बहला जाते हो।


कैसा दृश्य दिखाओगे तुम।

कैसी कथा सुनाओगे तुम।

नये पुराने किस चरित्र से 

कैसे कब मिलवावोगे तुम। 

बिना किसी योजना के ही 

जाने क्या दिखला जाते हो।

ऐसे ही तुम आ जाते हो।


घटनाएं जो घटी नही हैं।

हमे कभी जो दिखी नही हैं।

ऐसी वैसी जाने कैसी

जो बात किसी ने कही नही हैं।

उलझी अनसुलझी बातों मे 

हमको तुम उलझा जाते हो।

ऐसे ही तुम आ जाते हो।


दुख से कभी भरे रहते हो।

सुख से कभी हरे रहते हो।

देख तुम्हे क्या बीती हम पर

इन सब से परे रहते हो।

कभी कभी एक दृश्य मे ही 

दोनो एहसास करा जाते हो।

ऐसे ही तुम आ जाते हो।


सपनो से भी रहा ना गया।

ये इल्जाम सहा ना गया।

अपनी अंतर्कथा बतायी।

अपनी सारी व्यथा सुनाई।

ये जो चंचल मन है सबका

स्थिर कभी नही रहता है।

खुद अपने मे ही अक्सर वो

जाल नये नित बुनता है।


आधार बना अपनी बातों का

पटकथा मेरी , मन लिखता है।

उसमे कुछ परिवर्तन कर 

रंग नये कुछ भरता है।

ये रूप मेरा तेरे जरिये

सबको वो ही दिखलाता है।

है मेरा कोई दोष नही 

इल्जाम मेरे सर आता है।

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