वक्त का पहिया ऐसा घूमा पहले वाली बात कहां।
कागज के हों नाव तैरते ऐसी अब बरसात कहां।
साथ वक्त के रंग है बदला बदल गया माहौल यहां
शहरों का आवरण लिये अब गांव तो है देहात कहां।
फंसा दिया है राजनीति ने जाति धर्म के चक्कर मे
मिलकर हर त्योहार मनाएं ऐसे अब ख्यालात कहां।
हर कोई मशरूफ यहां है अपने अपने उलझन मे
चौंसठ खाने बिछे हुए हों वो शह और वो मात कहां।
जैसे झुण्ड कोई तारों का गिरकर अटका पेड़ों पर
जुगनू चमक रहे बागों मे इतनी सुन्दर रात कहां।

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