कभी कभी कुछ चेहरे
चेहरे नही रहते
वो रहते हैं मुखौटे।
जो दिखते हैं अक्सर
चेहरे की तरह ही।
चेहरे छिपा लेते हैं
अपने असली भाव
मुखोटे की आड़ मे।
वैसे तो मुखोटे होते हैं
बिल्कुल भावशून्य
पर इन् मुखौटों मे
होते हैं भाव दिखावे के
बिल्कुल झूठे बनावटी।
ये प्राकृतिक नही होते।
वास्तविक नही होते
असली चेहरे की तरह।
हमेशा बदलते रहते है
परिस्थिति के अनुसार
समय व स्थान के अनुसार
व्यक्ति विशेष के अनुसार।
स्वार्थ और चालाकी भरे
अवसरवादिता से पूर्ण।
जब आदत पड़ जाती है
चेहरे को मुखौटा बनने की
तो फिर एक नही दो नही
कई रूप बनते हैं चेहरे के
सुसज्जित मुखौटे की तरह।
जब जैसी आवश्यकता
उसी के अनुसार लेते है
चेहरे मुखौटे का रूप।
इसी अदला-बदली मे
चेहरे खो देते हैं वास्तविकता
वो रह जाते हैं एक मुखौटे
मात्र एक मुखौटे।

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