इस रस्म-ए-सियासत के बाजार नए हैं।
नाटक तो पुराना है किरदार नए हैं।
गुजरा है कोई शायद यूं इस तरफ अभी
लगता है कि मौसम के आसार नए हैं।
अब रौनक-ए-मयखाना होगा उरूज़ पर
महफिल में आज आए कुछ यार नए हैं।
हर कोई समझता है खुद को ही बादशाह
खुल रहे अब हर तरफ दरबार नए हैं।
बिगड़ेंगे या सुधरेंगे हालात शहर के
गलियों में आज बंट रहे अखबार नए हैं।
दुश्वारियां बहुत हैं नाख़ुदा के साथ भी
कश्ती है पुरानी बस पतवार नए हैं।
अब दूरियां उनसे मेरी कुछ और बढ़ेंगी
रिश्तों के बीच उठ रहे दीवार नए हैं।
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