नाम में क्या रखा है।
सिर्फ अपने नाम का होकर
हम आत्म केंद्रित होते हैं।
बहुत सीमित होते हैं।
नाम से बाहर निकलकर
हम व्यापक होते हैं
हमारा विस्तार होताहै।
ये अहसास होता है कि
अपने नाम के अतिरिक्त
हम कुछ और भी हैं।
यथार्थ
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जीवन जीने का अभ्यास।
कल्पनाओं में जीते हुए
यथार्थ समझने का प्रयास।
कभी योजना के अनुसार
कभी बस यूं ही अनायास
अक्सर होता रहता है
यथार्थ का आभास।
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