हर शख़्स के जुबां पर इतना सवाल क्यूं हैं।
इस दौर मे बात बात पर इतना बवाल क्यूं हैं।
किसी को किसी पर भी यकीं क्यों नही रहा
यहां हर शख्श का अलग ही ख्याल क्यूं है।
जो मिल गया उस पर तो कभी सब्र ना किया
जो मिल न सका उसका इतना मलाल क्यूं है।
इन्सान की गुस्ताखियाँ इस अंजाम तक पहुंची
वर्ना तो इस जहाँ का ये सूरत-ए-हाल क्यूं है
दावा तो करते फिरते हो कि दुश्मनी नही मुझसे
फिर चेहरे का रंग सामने आने पे लाल क्यूं है।

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