हम उनका भी बड़ा एहतराम रखते हैं।
एक चेहरे पे जो चेहरे तमाम रखते हैं।
दर्द गैरों का भी जो अपना समझते लेते हैं।
सारी दुनिया में वो ऊंचा मक़ाम रखते हैं।
पल भर में क्या होगा किसको पता यहां
और ज़माने का हम इंतज़ाम रखते हैं।
सादगी का अपना रुतबा ही अलग है
क्यों भला फिर लोग ताम-झाम रखते है।
है खता मेरी तो गुनाहगार हम ही हैं।
हम ना किसी पर कोई इल्जाम रखते हैं।
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