हम नही जायेंगे चांद पर
उतार लेंगे चांद को ही,
अपनी कविताओं में,
कभी अपने छत पर
कभी बालकनी में।
उलझा देंगे चांद को,
पेड़ों की टहनियों में
पत्तियों या डालियों में।
मुट्ठी में लेकर चांद को
या अपनी हथेली में
दे देंगे किसी को यूं ही
कभी किसी उपहार में
या किसी को प्यार में।
और वो इस व्यवहार को
काल्पनिक उपहार को
कर लेगा स्वीकार भी।
अनंत परिभाषाएं प्रेम की
और एक ये भी सही।
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