शब्द तो आतुर रहते हैं
जस का तस कह देने को
पर मैने उन्हे मर्यादाओं का
बोध करा के रखा है।
क्या लिखना है उंगलियों को
जिह्वा को क्या बोलना है।
सब कुछ निर्भर है शब्दों पर
निर्भर हैं शब्द अन्तर्मन पर
इन सबके बीच मैने थोड़ा
अवरोध बना के रखा है।
और मैने उन्हे मर्यादाओं का
बोध करा के रखा है।
बेवजह ना ऊंची हो पाये
आवाज पे एक नियन्त्रण हो।
जो कष्ट किसी को देते हों
हर बात पे एक नियन्त्रण हो।
इसलिये राह मे इनके एक
गतिरोध बना के रखा है।
और मैने उन्हे मर्यादाओं का
बोध करा के रखा है।

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