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Sunday, September 19, 2021

जीना भी एक इल्म है।

ऐसा नही कि खुश नही हैं जिन्दगी से हम।

शिकवा भी कर रहे हैं बड़ी सादगी से हम।


मिलते नही हो तुम ना गुजरते करीब से

उकता गये हैं अब तो तेरी बन्दगी से हम।


बुझने न दें चरागों को नकली हवाओं से 

भर दें चलो अंधेरों को सब रोशनी से हम।


पहचान क्या हमारी है अपनो को है पता

आओ तो पूछते हैं किसी अजनबी से हम।


जीना भी एक इल्म है सबको है सीखना

खुद को मिटा रहे हैं बड़ी संजीदगी से हम।


खोते ही जा रहे हैं हम खुद अपने आप से

रहते ही अब कहां हैं यहां आदमी से हम।


सबको है समझना यहां दुनिया का कायदा

मोहलत जरा सी ले लें चलो आवारगी से हम।

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