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Thursday, September 9, 2021

गर चांद जमी पर आ जाये।

        


शायर भी कहते रहते हैं।

आशिक भी कहते रहते हैं।

इश्क को साबित करने मे 

वो अपनी जान लड़ा देंगे।

महबूब अगर  उनका कह दे

तो चांद जमी पर ला देंगे।


वैसे तो  सिर्फ कल्पना है

सोचिये अगर ये हो जाये।

अतिशयोक्ति मे जो है कही गयी

पल भर भी वो सच हो जाये।

सारा भूगोल उलट जाये।

गर चांद जमी पर आ जाये।


सूरज बेचारा तरसेगा 

उस पहर किसे वो चमकाए।

करतब दिन-रात बदलने का

कैसे भला वो दिखलाये।

उसका सब खेल बिगड़ जाये

गर चांद जमी पर आ जाये।


सब तारे और सितारे भी

बिन चांद अकेले पड़ जायें।

इस विकट वियोग मे आखिर वो

कैसे फिर खुद को चमकाएं

बस याद मे वो भी मुरझाएं

गर चांद जमी पर आ जायें।


सागर की मचलती लहरें भी

ऊंचे उठने को तरस जायें।

जब चांद नही होगा ऊपर

तब ज्वार भला कैसे आये।

सागर भी सिथिल सा पड़ जाये।

गर चांद जमी पर आ जाये।


होने को बहुत हो सकता है

गर ऐसा कुछ भी हो जाय।

शायर व आशिक की बातों का

साहित्यिक आनन्द लिया जाये।

ये तो बस एक कल्पना है

कि चांद जमी पर आ जाये।


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