हे प्रजातन्त्र अब कहां हो तुम।
हे लोकतन्त्र अब कहां हो तुम।
ये तो नही तेरी परिभाषा।
फैली चारों तरफ हताशा।
तुमसे तो उम्मीद बहुत थी
फिर तुम क्यों दे रहे निराशा।
झूठी लालच मे जा बैठे
हे जनतन्त्र अब कहां हो तुम।
हे लोकतन्त्र अब कहां हो तुम।
जनता की आवाज बनो तुम।
सबका कल व आज बनो तुम।
सिर्फ तुम्हे अधिकार है इसका
वतन का तख्तो-ताज बनो तुम।
अपनी ताकत को पह्चानो
हे गणतंत्र अब कहां हो तुम।
हे प्रजातन्त्र अब कहां हो तुम।
जनता की सरकार रहे।
द्वारा जनता सरकार रहे।
जनता की आवाज समझ
जनता के लिये सरकार रहे।
सच्ची परिभाषा तो यही है
ऐसे लोकतन्त्र कहां हो तुम
हे गणतंत्र अब कहां तुम।
हे जनतंत्र अब कहां हो तुम।

No comments:
Post a Comment